Sunday, 12 June 2016

दीपक जायसवाल की कविता - भूख

जिस प्रकार दुनियां में मौलिक चिंतन शिक्षा पद्धतियों और शिक्षा नीतियों से स्वतंत्र रहा है उसी प्रकार बहुत अच्छी कवितायेँ पुरस्कार प्रदाताओं की नज़रों से स्वतंत्र रही है। दीपक बहुत मौजूँ लिखा है तुमने। ये उन लोगों को जवाब है जो कविता को सिर्फ चटक चांदनी रातों का हिसाब मानते है। मुझे पाश की याद दिला दी दोस्त। इस साल की मेरे द्वारा पढ़ी गयी अब तक की सबसे बेहतरीन कविता। - तरुण गुप्ता

भूख.....
"भूख के मरते ही मर जाता है आदमी
बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी
मरता तो तब भी है
जब वह सिर्फ अपने लिए जीने लगता है
जब दुनिया में कही कोई आदमी भूख से मरता
उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं
थोड़ा सा मर जाता है......
मरने को तो मर गया सिकन्दर भी,हिटलर भी
गांधी भी,नार्मन बरलॉग भी,टॉलस्टाय भी,मर्लिन मुनरो
और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी
पर इनके भूख में अंतर था
मरने में अंतर था....
तय है कि हम सब मरेंगें
मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी.....
हम इस नियति को बदल नही सकते
पर हम तय जरूर कर सकते हैं
मरने के तरीके को.....
कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे चलेगी
बहुत खुशकिस्मत हैं जो आप पढ़ सकते हैं
सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं
अपनी पसन्द के भूख को......
जानते हैं अंतड़ियों के सूखते हुए मरना कैसा होता है
अपने बच्चे को अपनी गोद में भूख से मरते हुए देखना कैसा होता है....
कभी सोचते हैं इनकी जिम्मेदारी किन पर है...
यदि नहीं तो आप मर चुके हैं....."
-दीपक कुमार.....

यूजीसी, एमएचआरडी और डूटा

 UGC ने पिछले कुछ सालों में जो खैरात NET और जे आर एफ के रूप में बाँटी है। वो आज इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि उसे समेटना अब विश्वविद्यालयों के बस में भी नहीं रहा। दिल्ली को ही ले लें। जामिया और जे एन यू के छात्रों को ये विश्वविद्यालय सिर्फ पढ़ाते हैं। नौकरी देने में इनका विश्वास नहीं ही है और न ही यहाँ के शिक्षक संगठनों के पास इसके लिये वक़्त है, मुझे नहीं लगता कि कोई ज्ञापन भी इन्होंने कभी कहीं सौपा है। बचा दिल्ली विश्वविद्यालय ये भी कहाँ तक संभाले, लेकिन फिर भी गले लगाता है। खैरात और अर्जन दोनों में कोई भेद नहीं करता। हर चार महीने बाद ये सारी खैरात रेजगारी की शक्ल में प्रिंसिपल के टेबल पर पड़ी होती है। प्रिंसिपल अपनी पसंद की गिन्नियां चुन लेता है। और बाकि रेजगारी खर्च होने के इंतज़ार में गल्ले(adhoc penal) में पड़ी रहती है। ये खेप अब इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि गल्ला फटने को है। तो सरकार ने हल निकाला कि क्यों न रेजगरियों को बाहर खुले बाजार में छोड़ दिया जाये, या नीलाम कर दिया जाये। तो ज़ीनत हर मंडी पर नुमाइश के लिए हाज़िर, और डूटा के बाशिंदों तुम्हारे पोस्टर सिर्फ एपीआई रोलबैक का शोर उठाते हैं।
 रेज़गारी अगर इतनी अधिक बढ़ गयी, तो उसमें शिक्षक संगठनो की भूमिका नहीं है क्या। आपके पोस्टरों को देखकर लगता है की आज सरकार एपीआई वापस ले ले तो सब चैन-ओ-सुकूं से जिएंगे। और आप we adhoc want appointments को पकडे रहिएगा भाई लोगों। डूटा के बाशिंदों आपके आंदोलन में शरीक होने बावजूद जो राजनीतिक गंध महसूस करता, और यहां जो लिख रहा हूँ हो सकता है उसकी कीमत मुझे अगले महीने चुकानी पड़े, पर अपने ही साथियों को बता दूँ। झंडाबर्दारी करनी है करिये। पर पहले अपने प्रतिनिधि तय कीजिये।
और हमारे एडहॉक साथी अभी तक आप डूटा के पोस्टर में भी जगह नहीं पा सके है। आपको खुद अपना पोस्टर और बिल्ला बनवाना पड़ रहा है। appointment का आपका, एपीआई का उनका, ये कब तक चलेगा। अभी जो हालात दिख रहें हैं उसमे हमारा adhoc कार्यभार बच जाये तो गनीमत समझिये। हर vc शुरू के साल खा ही जाता है त्यागी जी का नहीं पता। पर दूध के जले है न साहब क्या करें। तो भूल जाइए अपॉइंटमेंट। जब सर्कार DA ही किस्तों में बढ़ा रही है। तो नौकरी भूल जाइये साहब। और अगर हो भी गयी। vc के एक कार्यकाल में 100 नियुक्तियों का अनुपात रहा है पिछले वाला। आप मुझ पर ये सब लिखने पर गुस्सा कर सकते पर मुगालते मे मत रहिये प्लीज़।

कृष्णदत्त पालीवाल की वफ़ात पर

मैं उनके पढ़ाने के अंदाज़ की नक़ल उतारा करता। सच। मेरे लिए तब अज्ञेय, अज्ञेय ही थे। समझ नहीं आते थे। वो एम. ए. का अंतिम वर्ष था। 'पहला दोंगरा' और 'कलगी बाजरे की' समझ से परे थी। पालीवाल जी क्लास में आये पहले सी औचक मुद्रा में उन्होंने बिना किताब के इधर से उधर चक्कर काटते हुए दोनों हथेलियों को सामानांतर रखकर बताना शुरू किया। 'गगन में मेघ घिर आए...' उनका एक हाथ क्लास की छत पर लगे पंखे को पकड़ने चला। सब लड़के लड़कियां हंसने लगे। फिर अगली पंक्ति आई । 'तुम्हारी याद स्मृति के पीन्जड़े में बांध कर मैंने नहीं रखी।' हम सबकी हँसी एक गंभीर रोमांच में तब्दील हो गयी और फिर अज्ञेय कविता की कहीं घूमने चली गयी और पालीवाल जी पूरे लेक्चर में याद के समाजशास्त्र को समझाते रहे। और क्लास के ख़त्म होने पर कह गए की इस कविता को समझना है तो पहले उस 'याद' को समझो । ऐसा अक्सर होता। ये उनकी खूबी थी पर हमारे कई साथी इसे उनकी कमी मानते थे। आज वे सभी एक खालीपन का अनुभव कर रहे है। नमन।

ज़लज़ले से पहले

आस्तीनें बिना चढ़ाये,
आँखों को बिना लाल बनाये। 
कहते रहे अब तक, समझाते रहे अब तक। 
पर कब तक,
कब तक हम यूँही
उम्मीदों के सहारे 
मांगते रहेंगे अपने हक़ हर द्वारे। 
तो दोस्तों जो तुम्हारा, जो तुमको बहुत प्यारा है। बढ़ो और तादात में 
इतना कि खुद हथियार डल जाये 
तुम्हारे हक़ो के आगे।

तिहाड़ में आशा


उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।
कभी उसकी भी ऐसी
ज़िंदगी होती थी
इन चार दीवारों के 
खुल आँगन में वो बात कहाँ
जो घर परिवार के बंधन की
खुली चौखट में होती थी
उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।
कभी सुना था उसने 
'
कैद' भी कुछ होता है
कैदियों के बारे में सुनी थी उसने कहानी
अपनी नानी की ज़ुबानी
आज जब कैद खुद है वो 
तो नानी झूठ लगती थी
उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।

(2013-14 में शिवाजी कॉलेज ने WDC के लिये अपने छात्रों संग तिहाड़ की महिलाओं से बात की थी वहीं एक आशा नाम की लड़की से भी बात हुई थी। उसने बताया था कि उसे फँसाया गया है। इसके बाद मैं और विकास शर्मा जी उनके परिवार जिसमें माँ और छोटा भाई दीपक है, से मिले। हमने कोशिश की कि हम कुछ कर सकें। पर हम उनके लिये कुछ खास नहीं कर सके। तब यह कविता लिखी गयी थी। कभी कभी लगता है कविता खुद के असहाय होते जाने की प्रक्रिया है। बहुत गुस्सा आता खुद पर कभी कभी। )

live in Relationship


तुम सामने रसोई के दाल बीनती हो
मैं हाथ में कलम लिये तुम्हें देखता हूँ
तुम होंठों से चुप रहती हो
मैं कानो से सब कुछ सुनता हूँ
तुम्हारा ख़याल साथ लिये
साथ रहता हूँ
दिल में बहुत कुछ है मगर 
कुछ न कहता हूँ
क्या कहना 
हर रिश्ते की मजबूरी है
क्या प्यार में
दूर रहना जरूरी है

इसलिये साथ रहता हूँ
और कुछ न कहता हूँ।

शहतूत का पेड़

शहतूत का पेड़
कहते हैं 
तब यहाँ एक भी गाड़ी नहीं थी
न ऐसी सड़कें, न इमारतें ऐसी थीं
कहते हैं तब मैं छोटा था
सब कहते हैं 
कि अब मैं बड़ा हो गया हूँ
मैं फिर से ऐसा सुनते ही
बचपन की उस याद में खो जाता हूँ
जहाँ वो शहतूत का पेड़
मेरे बचपन में बड़ा हो चुका था।
जहाँ गिलहरियाँ
और वो पीली चोंच वाली 
काली गोरैया अठखेलियाँ खेलती थीं।
जहाँ चिड़ियों को पानी के छोटे सोतो में
नहाते देखा जा सकता था
जहाँ मैं बच्चा था
बाकि थे सब बड़े

फिर एक दिन 
गली के छोर पर 
पूरी बुलंदी से खड़ा
और अभिवादन में झुका 
शहतूत का वो पेड़ 
बड़ों के लिये समस्या बनने लगा
क्योंकि गाड़ियाँ बढ़ने लगीं
और कम पड़ने लगी 
उनको खड़ी करने की जगह
सो पेड़ कट गया
पेड़ का कटना 
दरअसल मेरे बचपन का कटना था 
उन गिलहरियों का बसेरा
पंछियों का डेरा
उन शहतूतों के गुच्छों का 
खत्म होना था
सिर्फ एक पेड़ के कटने से 
हमारे बचपन के जमघट छिन चुके थे 
इसके बाद 
मैं सीधे बड़ा हो गया।