जिस प्रकार दुनियां में मौलिक चिंतन शिक्षा पद्धतियों और शिक्षा नीतियों से स्वतंत्र रहा है उसी प्रकार बहुत अच्छी कवितायेँ पुरस्कार प्रदाताओं की नज़रों से स्वतंत्र रही है। दीपक बहुत मौजूँ लिखा है तुमने। ये उन लोगों को जवाब है जो कविता को सिर्फ चटक चांदनी रातों का हिसाब मानते है। मुझे पाश की याद दिला दी दोस्त। इस साल की मेरे द्वारा पढ़ी गयी अब तक की सबसे बेहतरीन कविता। - तरुण गुप्ता
भूख.....
"भूख के मरते ही मर जाता है आदमी
बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी
बहुत भूख से भी मर जाता है आदमी
मरता तो तब भी है
जब वह सिर्फ अपने लिए जीने लगता है
जब दुनिया में कही कोई आदमी भूख से मरता
उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं
थोड़ा सा मर जाता है......
मरने को तो मर गया सिकन्दर भी,हिटलर भी
गांधी भी,नार्मन बरलॉग भी,टॉलस्टाय भी,मर्लिन मुनरो
और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी
पर इनके भूख में अंतर था
मरने में अंतर था....
तय है कि हम सब मरेंगें
मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी.....
हम इस नियति को बदल नही सकते
पर हम तय जरूर कर सकते हैं
मरने के तरीके को.....
कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे चलेगी
जब वह सिर्फ अपने लिए जीने लगता है
जब दुनिया में कही कोई आदमी भूख से मरता
उस समय हर वह आदमी जिस की आँख में पानी मरा नहीं
थोड़ा सा मर जाता है......
मरने को तो मर गया सिकन्दर भी,हिटलर भी
गांधी भी,नार्मन बरलॉग भी,टॉलस्टाय भी,मर्लिन मुनरो
और आरकेस्ट्रा वाली मुनिया भी
पर इनके भूख में अंतर था
मरने में अंतर था....
तय है कि हम सब मरेंगें
मर जायेगा जेम्स बॉण्ड भी.....
हम इस नियति को बदल नही सकते
पर हम तय जरूर कर सकते हैं
मरने के तरीके को.....
कि कौन सी भूख हमें ताउम्र घसीटे चलेगी
बहुत खुशकिस्मत हैं जो आप पढ़ सकते हैं
सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं
अपनी पसन्द के भूख को......
जानते हैं अंतड़ियों के सूखते हुए मरना कैसा होता है
अपने बच्चे को अपनी गोद में भूख से मरते हुए देखना कैसा होता है....
कभी सोचते हैं इनकी जिम्मेदारी किन पर है...
यदि नहीं तो आप मर चुके हैं....."
सोच सकते हैं और तय कर सकते हैं
अपनी पसन्द के भूख को......
जानते हैं अंतड़ियों के सूखते हुए मरना कैसा होता है
अपने बच्चे को अपनी गोद में भूख से मरते हुए देखना कैसा होता है....
कभी सोचते हैं इनकी जिम्मेदारी किन पर है...
यदि नहीं तो आप मर चुके हैं....."
-दीपक कुमार.....