Sunday, 12 June 2016

कृष्णदत्त पालीवाल की वफ़ात पर

मैं उनके पढ़ाने के अंदाज़ की नक़ल उतारा करता। सच। मेरे लिए तब अज्ञेय, अज्ञेय ही थे। समझ नहीं आते थे। वो एम. ए. का अंतिम वर्ष था। 'पहला दोंगरा' और 'कलगी बाजरे की' समझ से परे थी। पालीवाल जी क्लास में आये पहले सी औचक मुद्रा में उन्होंने बिना किताब के इधर से उधर चक्कर काटते हुए दोनों हथेलियों को सामानांतर रखकर बताना शुरू किया। 'गगन में मेघ घिर आए...' उनका एक हाथ क्लास की छत पर लगे पंखे को पकड़ने चला। सब लड़के लड़कियां हंसने लगे। फिर अगली पंक्ति आई । 'तुम्हारी याद स्मृति के पीन्जड़े में बांध कर मैंने नहीं रखी।' हम सबकी हँसी एक गंभीर रोमांच में तब्दील हो गयी और फिर अज्ञेय कविता की कहीं घूमने चली गयी और पालीवाल जी पूरे लेक्चर में याद के समाजशास्त्र को समझाते रहे। और क्लास के ख़त्म होने पर कह गए की इस कविता को समझना है तो पहले उस 'याद' को समझो । ऐसा अक्सर होता। ये उनकी खूबी थी पर हमारे कई साथी इसे उनकी कमी मानते थे। आज वे सभी एक खालीपन का अनुभव कर रहे है। नमन।

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