Sunday, 12 June 2016

तिहाड़ में आशा


उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।
कभी उसकी भी ऐसी
ज़िंदगी होती थी
इन चार दीवारों के 
खुल आँगन में वो बात कहाँ
जो घर परिवार के बंधन की
खुली चौखट में होती थी
उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।
कभी सुना था उसने 
'
कैद' भी कुछ होता है
कैदियों के बारे में सुनी थी उसने कहानी
अपनी नानी की ज़ुबानी
आज जब कैद खुद है वो 
तो नानी झूठ लगती थी
उड़ते परिंदों को देखकर वो बहुत खुश होती थी।

(2013-14 में शिवाजी कॉलेज ने WDC के लिये अपने छात्रों संग तिहाड़ की महिलाओं से बात की थी वहीं एक आशा नाम की लड़की से भी बात हुई थी। उसने बताया था कि उसे फँसाया गया है। इसके बाद मैं और विकास शर्मा जी उनके परिवार जिसमें माँ और छोटा भाई दीपक है, से मिले। हमने कोशिश की कि हम कुछ कर सकें। पर हम उनके लिये कुछ खास नहीं कर सके। तब यह कविता लिखी गयी थी। कभी कभी लगता है कविता खुद के असहाय होते जाने की प्रक्रिया है। बहुत गुस्सा आता खुद पर कभी कभी। )

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