Saturday, 13 April 2013

17वाँ देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान प्रियम अंकित को ...


समकालीन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान किसी युवा आलोचक(४५ वर्ष की आयु तक) को १९९५ से हर वर्ष प्रसिद्ध आलोचक देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनके जन्म दिवस ०५ अप्रैल को दिया जाता है। इस बार का १७वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान  वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव द्वारा आलोचक प्रियम अंकित को उनकी आलोचना पुस्तक ‘पूर्वाग्रहों के विरुद्ध’ पर साहित्य अकादमी सभागार में ०५ अप्रैल को प्रदान किया गया इस अवसर पर आयोजित ‘आलोचना के नये पूर्वाग्रह’ विषयक गोष्ठी में वैभव सिह, बजरंग बिहारी तिवारी, अभय कुमार दुबे और प्रियम अंकित नें अपने वक्तव्य दिये और कार्यक्रम का संचालन संजीव कुमार ने किया।  
पुरस्कार निर्णायक समिति के वक्तव्य और प्रशस्ति पाठ का वाचन करते हुए आलोचक नित्यानंद तिवारी ने बताया कि इस पुरस्कार का चयन पाँच सदस्यीय निर्णायक समिति सर्वश्री राजेंद्र यादव, अजित कुमार, नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, और सुश्री अर्चना वर्मा द्वारा सर्वसम्मति से किया गया। इससे पूर्व यह पुरस्कार मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविंद त्रिपाठी, कृष्ण मोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणय कृष्ण, सुश्री प्रोमिला के.पी. ,  संजीव कुमार और जितेंद्र श्रीवास्तव को मिला है वर्ष १९९९ इसका अपवाद है क्योंकि किसी व्यक्ति को सम्मान के योग्य पाया नहीं जा सका था।  
२६ अगस्त १९७६ में कानपुर में जन्मे प्रियम अंकित आगरा कॉलेज, आगरा के अंग्रेजी विभाग में अध्यापनरत हैं उनकी यह पहली पुस्तक समकालीन कहानी की आलोचना में संभावनाओं के नए द्वार खोलती है जिससे अनेक कोणों से आज की कथादृष्टि को परखा जा सकता है।
इस मौक़े पर आलोचक और निर्णायक समिति के सदस्य नित्यानंद तिवारी ने प्रियम अंकित को दिये गये प्रशस्ति पत्र को पढ़ते हुए कहा कि ‘पूर्वाग्रहों के विरुद्ध यह केवल किताब का शीर्षक नहीं है यह प्रियम अंकित की आलोचनादृष्टि का प्रस्थान बिंदु है। प्रगतिवादियों और प्रयोगवादियों की रस्साकशी के पुराने पड़ गये राग को पीछे छोड़ कर वे पूर्वाग्रहों की संहिता के विरुद्ध मोर्चा खोलने के अलावा अपनी पीढ़ी के रचनाकर्म को नवोन्मेष का नाम देते हैं और उसको व्यावहारिक उदाहरणों के साथ सप्रमाण चिंहित करते हैं। उनकी किताब नवोन्मेष की दुनिया के गली, चौराहों, सड़कों, स्थानों, दरवाजों पर लगे नामपट्ट और उन नामों की अपनी विशिष्ट संभावनाओं का नक्शा पेश करती है। इसे नवोन्मेष की इस संहिता का सूत्रपात कहा जा सकता है। नवोन्मेष की इस दुनिया का देशकाल उत्तर आधुनिक है तीसरी दुनिया में इस कालगति के संग अपने परिप्रेक्ष्य में प्रियम निरंतर यह सजगता बनाये रखते हैं कि विकल्पों के अतिशय और बहुलता की इस दुनिया में एक तरफ अब तक स्थिरता और शाश्वतता अर्जित की गई सत्ताओं के खिलाफ़ विद्रोह करने का आत्मतोष तो दूसरी तरफ व्यवस्था परिवर्तन के लिये होने वाले तमाम सकारात्मक प्रयासों को ग्रैंड-नैरेटिव या मेटा-नैरेटिव कहकर खारिज कर देने की सुविधा भी मौजूद है, बहुलता का स्वागत भी है और चुनाव की सावधानी भी, जिसे प्रियम नें नवोन्मेष का नाम दिया है वह अपनी दुनिया के बाहर अभी तक प्रायः कुछ संदेश कुछ आशंका के साथ विवादास्पद है। प्रियम ने एक ओर उसके पक्ष से मोर्चा खोला है तो दूसरी ओर भीतर आने का दरवाजा भी। उन्होंने व्यवस्था और सत्ता के सांस्कृतिक छद्म सूचना प्रौद्योगिकी का अदम्य विस्तार. उपभोक्ता समाज के भीतर पनपती नव-साम्राज्यवादी और फासीवादी प्रवृत्ति, विभ्रम, यथार्थ आदि उत्तर-आधुनिक आलोचना के शब्दकोश और मुहावरों को निरीह अकादमिक और बौद्धिकता के छद्म से छुड़ाकर कहानी के मध्म में निहित सत्य की पहचान का जरिया बनाया है और रचनाओं में अभिव्यक्ति की विडंबनाओं को रेखांकित किया है। हिंदी की आलोचना में इसे एक नई शब्दावली के विकास की पहल के रूप में देखा जा सकता है। हिंदी कहानी के नवोंमेष को अगले पड़ाव को सुव्यवस्थित रूप से चिंहित, सुविचारित ढंग से विश्लेषित और संतुलनपूर्वक मूल्यांकित करने और इस क्रम में आलोचना की एक उपयुक्त शब्दावली विकसित करने के लिए वर्ष २०१३ का देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान प्रियम अंकित को दिया जा रहा है।‘

पूर्वाग्रहों को प्रेरित करते रहा जाए ताकि वे आत्मालोचना से जी न चुराएं – प्रियम अंकित

‘आलोचना के नये पूर्वाग्रह’ विषय पर बोलते हुए प्रियम ने कहा कि ‘रचनाकार और आलोचक दोनों ही एक विशेष समय का और एक विशेष समाज का हिस्सा होते हैं उस समय और समाज की मान्यताएँ, अभिरुचियाँ, संस्कार, आस्वाद, विचार आदि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के भीतर व्यापते हैं हमारी साहित्यिक चेतना हमारी वास्तविक सामाजिक दुनिया के भीतर ही आकार लेती है हालाँकि यह भी सत्य है कि रचना खुद अपना एक समानांतर समाज भी रचती है और आलोचना की एक जिम्मेदारी यह भी है कि वह इस समानांतर समाज का भी नागरिक होने की तमीज़ हममे पैदा करे।‘ उन्होंने आगे कहा कि ‘हर समाज के अपने पूर्वाग्रह होते हैं क्या यह रचनाकार  और आलोचक दोनो के लिये संभव है कि जिस समाज का हिस्सा वे होते हैं उसके पूर्वाग्रहों का पूरी तरह अतिक्रमण कर सकें। फ़िराक़ साहब के शेर –
‘किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी। 
ये हुस्नो इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी।।‘ 

का हवाला देते हुए वे कहते है कि ‘आलोचना का एक काम रचना के भीतर और अपने भीतर इसी ‘मगर फिर भी‘ की व्यापकता और गहराई की खोज करना है आज की हिंदी आलोचना में स्थित पूर्वाग्रहों की खोज के बिंदु बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना में देखने के क्रम में उनका कहना है कि आज आलोचना में जो कुछ भी नया है चाहे वो नया सामर्थ्य हो या नये पूर्वाग्रह उसके सूत्र बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना के अंतिम दशक की रचनात्मक और विमर्शात्मक त्वरा में खोजे जा सकते हैं’ वे रचनादृष्टि और आस्वाद के नये धरातल को सुगम बनाने को भी आलोचना का एक प्रमुख काम मानते हैं। वे आगे कहते हैं कि कला तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर जो भी पूर्वाग्रह व्याप्त हों - चाहे वे नये हों या पुराने – उनका विरोध करना आलोचना के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। लेकिन आलोचना जब इस पूर्वाग्रह का विरोध करने के क्रम में नये कहानीकारों पर हावी रूपकात्मकता, फैंटेसीप्रियता, वाक्चातुर्य आदि तत्वों का बेजा समर्थन करने लगती है, तो दूसरे किस्म के नये पूर्वाग्रहों की स्थापना होती है। अंत में अपने वक्तव्य का निष्कर्ष देते हुए और पूर्वाग्रह का लगभग समर्थन करते हुए वे कहते है कि “पूर्वाग्रह पुराने हों या नये आखिर तो कहलाएंगे ‘पूर्वाग्रह’ ही आलोचना में अगर कोई पूर्वाग्रह दरकार हो भी, तब भी, आलोचना का भला इसी में है कि पूर्वाग्रहों को प्रेरित करते रहा जाए ताकि वे आत्मालोचना से जी न चुराएं।“ 

रचना कई बार अपने जन्म की परिस्थितियों से पूर्वाग्रह लेकर आती है – वैभव सिंह 

आलोचना के नये पूर्वाग्रह विषय पर अपनी बात रखते हुए वैभव सिंह ने कहा कि जब हम नये पूर्वाग्रह की बात कर रहे होते हैं तो क्या हम यह कह रहे होते हैं कि पुराने पूर्वाग्रह वाकई पुराने पड़ गये है जिसमे कहा जाता था कि अज्ञेय बड़े या नागार्जुन। हालांकि यह बड़ा चुनौतिपूर्ण काम है और यह भी कि पूर्वाग्रह जीवित मनुष्यों के ही होते है मुर्दों के नहीं। लेखक जब भी लिखता है वह समय संकटपूर्ण ही होता है क्योंकि हर युग के अपने संकट होते हैं जिस तरह लेखक के लिेए कोई समय संकटविहीन नहीं होता उसी तर्ज पर लेखक के लिए कोई भी समय पूर्वाग्रहविहीन नहीं होता। पूर्वाग्रह दरअसल इन परिस्थितियों की ही उपज होते हैं। पूर्वाग्रहों का संबंध सिर्फ आलोचक के मन से नहीं होता बल्कि वे अपने समय की विचारधाराओं और अपने समय के वर्चस्वशाली झूठ और वर्चस्वशाली सत्य से आते हैं। रचना कई बार अपने जन्म की परिस्थितियों से पूर्वाग्रह लेकर आती हैं और युगीन परिस्थितियाँ पूर्वाग्रह को जन्म देतीं हैं। अपने समय की रचनाशीलता का विश्लेषण हमेशा से ही आलोचना के लिए एक चुनौती रहा है आज भी एक वर्ग विचारधारा और साहित्य को अलगाने के पक्ष में है। आज जिस तरह से विचारधारा की संस्कृति पर आक्रमण किया जा रहा है वह आलोचना और रचना दोनो की ही संस्कृति के लिये खतरा है। यह एक तरह से आलोचना का बौद्धिक संकट है। वैभव ने आगे सवाल किया कि पूर्वाग्रहों से मुक्ति का क्या अर्थ है? हमें यह भी साफ करना होगा। दरअसल रचना और आलोचना में संबंध बना रहे हमारी कोशिश इसमें निहित रहनी चाहिये। रचना को कच्चा माल समझने से बचना चाहिए यह एक तरह से रचना का निरादर है।


पूर्वाग्रहों से मुक्ति की पूर्व शर्त है पूर्वाग्रहों की ठीक-ठीक पहचान करना – बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत में कहा कि पूर्वाग्रहों को पहचाने बिना उनसे मुक्त होने या उन्हें गले लगाने का निर्णय नहीं लिया जा सकता। उनका कहना था कि  वे अपने थोड़े बहुत लेखन और विमर्श के जिस क्षेत्र में सक्रिय हैं वह तो  पूर्वाग्रहों का बड़ा उर्वर इलाका है उन पूर्वाग्रहों  के बारे में न बोलकर उस स्थिति पर बात की जिससे मुखातिब होने से समकालीन हिंदी आलोचना कतराती नजर आती है कतराने का यह उपक्रम पूर्वाग्रह विशेष के चलते है हिंदी की उपभाषाओं के स्वतंत्र होने के आंदोलन में निहित पूर्वाग्रह का जिक्र करते हुए उन्होंने रामविलास शर्मा का हवाला देते हुए कहा कि रामविलास शर्मा ने परंपरा का मूल्याँकन में मैथिली भाषा के आंदोलन पर विचार करते हुए यह उम्मीद जताई थी कि पृथकता का यह आंदोलन सफल नहीं होगा और हिंदी जाति अक्षुण्ण बनी रहेगी पर इतिहास ने उन्हें सही साबित नहीं किया। संस्कृत और प्राकृत के उदाहरणो का प्रयोग कर वे निष्कर्ष निकालते हैं कि इस देश में उनके देखते भाषिक बहुलता शर्म का विषय कभी नहीं रही। जिन्हें हिन्दी की बोलियां कहा जाता है वे भले अब अपने को भाषा कह रहीं हैं इन भाषाओं के बोलने वालों ने अपने को हिंदी से अलगाते हुए स्वतंत्र भाषआ का दर्जा पाने के लिए अपना आंदोलन तेज किया है। कभी इस समस्या पर रामविलास शर्मा ने मैथिली आंदोलन के संदर्भ में कहा था कि यह बोली हिंदी से अलग नहीं होगी पर इतिहास ने उन्हें सही साबित नहीं किया। बोलियों के अलगाव के आंदोलनों के प्रश्न पर समकालीन हिंदी आलोचना किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आती है। इस समस्या को सही संदर्भ में समझने के लिए हमें बीसवीं सदी के पहले से चौथे दशक के हिंदी साहित्य की पड़ताल करनी होगी। उनका कहना था कि यह दौर जागरण और सुधार के युग के रूप में जाना जाता है। इसी दौर में हम औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हुए। इसी दौर में हिंदी भाषा की अपेक्षा भाषा का एक अन्य रूप सभ्य होने की शर्त समझा जाने लगा और रीति कविता को एक कलंक समझा जाने लगा। करीब ५०० वर्षों तक जो भाषा अखिल भारतीय स्तर पर साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त और स्वीकृत माध्यम थी उसे परिदृश्य से ओझल कर देने का लगभग सफ़ल प्रयास किया गया। अंत में उनका कहना था कि ब्रजभाषा के खिलाफ़ यह अभियान वास्तव में हिन्दी का अपनी ही उपभाषाओं के विरुद्ध अभियान बना। इसके बाद आधुनिक हिन्दी का जो छिन्नमूल अहंकारी रूप निर्मित हुआ वह हम सबके सामने है।

   पूर्वाग्रह अतीत और भविष्य के मध्य सेतु का काम करते हैं – अभय कुमार दुबे

अभय दुबे ने अपने वक्तव्य की शुरुआत बजरंग बिहारी तिवारी के देव के संदर्भ में कहे गये कथन को उठाते हुए की और रामविलास शर्मा के हवालों से इस शीर्षक पर अपना वक्तव्य दिया उन्होंने कहा कि रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल की जो आलोचना स्थापित की वे रामविलास शर्मा के रास्ते होते हुए ही हिंदी में स्थापित हुई। उन्होंने कहा कि रामविलास जी को नायिका-भेद से दिक्कत है जबकि नायक-भेद से नहीं। नायिका-भेद से रामविलास जी को घोर आपत्ति है जो कि एक बड़ा पूर्वाग्रह है। देह विमर्श नाम का एक डंडा हिंदी में बना लिया गया है जिससे हिंदी के नारीवादियों को लगातार पीटा जाता रहा है। पर ऐसा नहीं है कि ‘मैं पूर्वाग्रह को लेकर बहुत चिंतित हूँ मुझे लगता है कि पूर्वाग्रह अतीत और भविष्य के मध्य सेतु का काम करते हैं।‘ उन्होंने हजारी प्रसाद जी के संबंध में रामविलास जी के पूर्वाग्रहों का संकेत देते हुए कहा कि  हजारी प्रसाद जी द्वारा रीतिकाल को सैकुलर काव्य कहने की वजह से रामविलास जी कुपित रहे। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि हिंदी में मार्क्सवादी राजनीति जितनी नाकामयाब है उतना ही सास्कृतिक मार्क्सवाद कामयाब है। इसे थोड़े चुटीले लहजे में लेते हुए उन्होंने कहा कि परम श्रद्धा के साथ मार्क्सवाद की दुनिया में जो नये काम हुए हैं हम उन्हें नहीं पढेंगे। हिंदी की दुनिया अभी भी साठ-स्त्तर के जमाने के मार्क्सवाद में अटकी है। आज की पूँजी को समझने के लिए पुराना मार्क्सवाद कोई सामग्री उपलब्ध नहीं करवाता। ये कैसा पूर्वाग्ह है कि हिंदी के साहित्यिक रूप को तरजीह दी जाती है और बाकि रूपो को खारिज कर दिया जाता है लिखित और पाठीय संस्कृति को इस भाषा ने आतंकित किया है इससे बोलियाँ त्रस्त हैं क्या टी.वी की भाषा का अपना संदर्भ नहीं है जबकि हम जानते है कि वह एक दृश्य भाषा है।
सभी वक्ताओं के वक्तव्य के बाद राजेंद्र यादव ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रियम अंकित को बधाई दी पर साथ ही यह चिंता भी जताई की आज के आलोचक समय-समय पर लिखे-पढ़े गये लेखों को जोड़कर किताब की शक्ल दे देते हैं। उन्हें यह शिकायत प्रियम से भी है उन्होंने कहा कि क्या यह अच्छा न होता कि प्रियम प्रतिबद्धता और विचारधारा को लेकर एक पुस्तक लिखते या आलोचना के पूर्वाग्रह नामक इसी पुस्तक को एक सूत्रबद्ध ढ़ंग से लिखते। उन्होंने कमलेश अवस्थी के प्रति अपना आभार जताते हुए कहा कि देवीशंकर जी से उनके व्यक्तिगत संबंध थे। वे आज भी उनसे भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं इसलिये वे यहाँ आ सकें या न आ सकें पर मानसिक रूप से इस समारोह में हमेशा उपस्थित रहते हैं। इसी सुअवसर पर देवीशंकर अवस्थी की पुस्तक ब्रजभाषा भक्तिकाव्य का उत्तरार्द्ध का विमोचन वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव और नित्यानंद तिवारी द्वारा किया गया।  
मंच संचालन देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित आलोचक संजीव कुमार ने किया। इस अवसर पर साहित्य समाज के जाने माने लेखक-साहित्यकार नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी, सुरेश सलिल, देवेन्द्र राज अंकुर, जितेंद्र श्रीवास्तव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, शरद दत्त, निर्मला जैन, बलराम, देवीप्रसाद त्रिपाठी, पंकज चतुर्वेदी, भाषा सिंह, गंगा प्रसाद विमल, दिनेश मिश्र, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, प्रसून लतांत, मेत्रैयी पुष्पा, रश्मि वाजपेयी, सुनीता बुद्धिराजा, रेखा अवस्थी व अवस्थी जी का परिवार उनके पुत्र, पौत्र व पुत्र-वधु आदि उपस्थित रहे।        
 प्रस्तुति -  तरुण गुप्ता
मोबाइल - 09013458181

Wednesday, 4 July 2012

कार्टून विवाद : लोकतंत्र पर सवालिया निशान

भारत जैसे देश में जहाँ राजनीति धर्म और जाति की आड़ में होती हो वहाँ              पिछला कार्टून प्रकरण एक बहुत बड़ी बात हमारे सामने रखता है। कार्टून खराब है। इसे किसकी भावनाओं को धक्का लगता है। यह बाद का सवाल है पर सबसे पहला और मौजूँ सवाल तो यह है कि इससे देश की संसद के उन सदस्यों की समझ की पोल एक बार फिर खुल गयी है जो किसी भी तर्ज़ पर एक बहसनुमा माहौल के पक्ष में नहीं हैं।  कार्टून का स्कैच कुछ यों है - एक घोंघा जिस पर संविधान लिखा है और जिस पर डॉ. अंबेडकर बैठें हैं उनके हाथ में चाबुक हैं और वो उसे हाँक रहे हैं उन्हीं के बगल में थोड़ा पीछे को जवाहरलाल नेहरू खड़े हैं उनके हाथ में भी चाबुक है। जनता तमाशबीनों में शामिल हैं। इस प्रकरण पर कुछ एक को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों का रुख़ साफ है कि ऐसे कार्टून(सिर्फ यही नहीं) जिनमें बाबा साहेब और दलितों को अपमानित किया गया है तुरंत हटा देना चाहिए संसद में ये चीखें बेहद तेज़ी और तल्ख़ी से उठायी जा रहीं हैं मैडम सोनिया डैस्क पीट पीटकर कर ये कहने पर आमादा हैं कि यहीं नहीं बल्कि सभी कार्टूनों को किताबों से हटाओ। मिस्टर सिब्बल हाथ-जोड़ कर माफी मांग रहे हैं। न्यूज़ चैनल इस करबद्धता को दिखाने में व्यस्त हैं। हालत ये है कि जिन किताबों में ये कार्टून है। जिस सलाहकार समिति ने इसे किताबों में रखा हैं। उन्हें देखना उन पर चर्चा करना, अब अपमान समझा जा रहा है। हम ऐसे समय में जी रहें है जब हमारे साथी, हमारे प्रतिनिधी, मंत्री सिर्फ इस डर से कि कहीं उन्हें दलित विरोधी न मान लिया जाता इस प्रकरण पर बात करने से कतरा रहें हैं।

इस कार्टून विवाद पर बात करते वक्त हमें यह जानना होगा कि असल मसला है क्या , और बनाया क्या जा रहा है? यह कार्टून शंकर ने सन् १९४९ में बनाया था जिसे योगेंद्र यादव और सुहास पलसीकर ने ग्यारहवीं की राजनीति विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में संदर्भित मुद्दे के अनुरूप डाला जैसे और कार्टून डाले गये थे। सनद रहे कि ये कार्टून कोई पाँचवी-छठी की किताब में नहीं बल्कि ग्यारहवीं की पुस्तक में दिए गये। हमें ये भी समझना होगा कि क्या ग्यारहवीं कक्षा के छात्रों, अध्यापकों या फिर उस सलाहकार समिति ने इस पर कोई आपत्ति नहीं उठायी थी जिस पर कि राजनीतिक दलों ने हल्ला बोला। बाबा साहेब हमारे लिए आदरणीय हैं और हमेशा रहेंगे। इस मुद्दे को दलित-सवर्ण पॉलिटिक्स का हिस्सा बनाने की अपेक्षा हमें इसे एक अलग स्तर पर समझना होगा। निश्चित ही जिन राजनीतिक दलों ने इस कार्टून को वापस लेने का फतवा जारी किया या जो लोग इसके पक्ष में हैं वे सभी इसे दलित-सवर्ण एंगल से व्याख्यायित कर रहे हैं। लेकिन क्या दलित भाइयों में  कुछ भी ऐसे नहीं हैं जो ये मानते हों कि हमारे देश के भविष्य छात्रों को इस मुद्दे पर अपनी बात रखने हक़ है। और इसी तरह अधयापकों , शिक्षाशास्त्रियों को इस मुद्दें पर बहस में शामिल होने का हक हैं। उसके बाद इसे पाठ्यपुस्तकों में रखने या न रखने का निर्णय लिया जाना चाहिए था पर भारत के इस लोकतंत्र में एक निरंकुश शासन की भाँति फतवा सुनाया गया। क्या लोकतंत्र इसी को कहते है जो सिर्फ भावनाओं में बहकर एक पक्ष की ही सुनकर रह जाए। जैसाकि मैंने कहा कि हालत ये हो गयी है कि कार्टून के पक्षकारों को दलितविरोधी मान लिया गया हैं। मुझे भी समझा जा सकता हैं। लेकिन क्या हम इन्हीं आधारों पर अपने लोकतंत्र को बनाये रख पाएंगे।। आप जानते हैं कि दक्षिण एशिया में सिर्फ दो ही देश है जिनमें अब तक भी लोकतंत्र बरकरार हैं और हम उनमें से एक हैं क्या हमारा देश इतना कमजोर हो गया हैं कि किसी मुद्दे पर बहस की अपेक्षा उसे सिर्फ इसलिए खारिज किया जाए क्योंकि वह एक खास तबके की वोट राजनीति का हिस्सा है। क्या कार्टून को हटाने से दलित भाइयों के साथ न्याय हो सकेगा। हमारा मानना है कि इस देश के छात्रों पर इस तरह के निर्णयों को छोड़ना चाहिए था पर ये काम भी हमारे सांसदों ने अपने हाथ में ले लिया। क्या ग्यारहवीं कक्षा के विद्यार्थियों को आप बिल्कुल नासमझ मान कर चल रहे हैं या आपका विश्वास है कि हमारी शिक्षा पद्धति इतनी सक्षम नहीं कि वह हमारे देश के विद्यार्थियों को इस कार्टून का सही अर्थ समझा सके। दोनों ही सूरतों में सरकार दोषी होगी न कि पाठ्यक्रम बनाने वाले अथवा कोई जाति या वर्ग।
हमें ताज्जुब है कि जिनके बारे में ये फैसला लिया गया उन बच्चों से, उनके अध्यापकों से इस संदर्भ में पूछा ही नहीं गया और तो और योगेंद्र यादव और सुहास पलशिकर को भी खुद को डिफेंड करने का मौक़ा नहीं दिया गया हम कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं ये कैसा देश हैं जहाँ एक अध्यापक किसी राज्य की मुख्यमंत्री पर व्यंग्य किए गये कार्टून को ईमेल के जरिए फॉरवर्ड  करता हैं और रात को ही उसे जेल में डाल दिया जाता है। क्या लोकतंत्र पर ही सवालिया निशान नहीं है। कम से कम बाबा साहब ने तो ऐसा लोकतंत्र अथवा संविधान नहीं बनाया था जो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मुखालफत करता हो या अपनी बात कहने की स्वतंत्रता न देता हो।पर वर्तमान हालातों को देखकर तो लगता है यहाँ सुनना कोई नहीं चाहता सब कहना चाहते हैं। और कहना भी क्या आदेश देना चाहते हैं। योगेंद्र यादव और सुहास पलशिकर ने इस्तीफा दिया पर किसी को कोई आपत्ति नहीं हुई उन्हें अपनी सफाई देने का मौक़ा तक नहीं दिया गया पर किसी को कोई दिक्कत नहीं। दिक्कत हैं तो सिर्फ कार्टून से। क्या आप वाकई मानते हैं कि ऐसे कार्टूनों को इतिहास के गर्भ में दबा देना चाहिए। क्या इतिहास हमारी वर्तमान नस्लों से अपने पुनर्मूल्याँकन की उम्मीद नहीं रखता। हमारी कोशिश यहाँ कार्टून की व्याख्या करने की नहीं है और न ही मैं उसके हटाने या रखने के पक्ष या विपक्ष में रखने के फेर में पड़ना चाह रहा हूँ। हाँ हम ये जरूर चाहते हैं कि ऐसे मुद्दों पर या विषयों पर जो देश के छात्रों उनकी किताबों अथवा पढ़ाई लिखाई से संबंधित हों उन पर उनका रुख जरूर लिया जाए। जिस सलाहकार समिति ने इन कार्टूनों को रखा क्या उनकी राय लेना या वो इन्हें रखने के पक्ष में क्यों है जानना बिल्कुल ज़रूरी नहीं। हम किस तरह के लोकतंत्र को बनाना चाहते हैं क्या ऐसा लोकतंत्र जिसमें सवर्ण सवर्ण नेताओं के और दलित दलित नेताओं के कंठ से अपना कंठ में मिला दे कम से कम बाबा साहेब तो ऐसा बिल्कुल नहीं चाहते होंगे।

Monday, 7 May 2012

16वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान : एक रिपोर्ट


16वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह अपनी परंपरानुसार अवस्थी जी के जन्मदिवस 05 अप्रैल को साहित्य अकादमी के सभागार में संपन्न हुआ। इस मौके पर आधुनिकता और भारतीयता विषय पर इतिहासकार सुधीर चंद्र और संस्कृत के विद्वान राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने अपने वक्तव्य दिये। कार्यक्रम की अध्यक्षता आलोचक नित्यानंद तिवारी ने की। संचालन का दारोमदार संभालते हुए अशोक वाजपेयी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि यह आयोजन दिल्ली के उन बहुत थोड़े से आयोजनों में है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में श्रोताओ की उपस्थिति होती है। ये भी इसकी प्रमाणिकता का एक और साक्ष्य है।

 हर बार की तरह इस बार भी विचार विमर्श के लिए जो विषय चुना गया वह समकालीन आलोचना की चिंताओं को अपने में जज़्ब किये था। विषय था आलोचना और भारतीयता। सबसे पहले जितेंद्र श्रीवास्तव को पुरस्कारस्वरूप प्रशस्ति पत्र और अवस्थी जी की प्रतिमा भेंट की गई। यह पुरस्कार जितेंद्र श्रीवास्तव को उनकी पुस्तक ‘आलोचना का मानुष-मर्म’ के लिये दिया गया। इस अवसर पर जितेंद्र ने अपना वक्तव्य पढ़ते हुए आलोचना को विद्वता प्रदर्शन की नहीं बल्कि सृजन की पाठशाला माना। साथ ही उन्होंने कहा कि जब तक हम लोग आलोचना को आश्रित विधा मानते रहेंगे तब तक उसे दार्शनिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं बना पाएंगे, जो उसका मुख्य कार्य है। उनके लिए आलोचना का आशय रचना की परख के साथ ही इस पक्ष की परख भी है कि वह मानुष-मर्म के विधान का उद्यम करती है या नहीं? यदि आलोचना किसी रचना में निहित मानवीय जिजीविषा और गरिमा का विश्लेषण नहीं कर पाती या उससे बचने का मार्ग खोजती है तो मेरे लिए वह बुद्धि विलास के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे अपनी आलोचना की कसौटी आलोचना में अंतर्वस्तु के सौंदर्य को मानते हैं साथ ही यह भी कहते चलते हैं कि इसका आशय यह नहीं है कि मैं रूप को अस्वीकार कर रहा हूँ। जितेंद्र श्रीवास्तव की चिंताएँ पिछले बीस बाइस वर्षों के साहित्य, समाज और राजनीति में होने वाले परिवर्तनों को लेकर भी है और इस बदलाव को समझने के लिए वे चित्त के बदलाव को समझना आवश्यक मानते हैं वे साहित्य को सुविधा का क्षेत्र समझने वालो के विरुद्ध है उनका कहना है कि साहित्य अनिवार्य रूप से सुविधा का क्षेत्र नहीं है।  इधर के कुछ वर्षों में कविता को खेल समझने का चलन बढ़ा है। यह सिर्फ कविता के लिेए ही नहीं संपूर्ण साहित्य के लिए भी चिंता का विषय है।

 आधुनिकता और भारतीयता विषय पर बोलते हुए सुधीर चंद्र ने कहा कि उनके मन में अवस्थी जी से न मिल पाने की कसक और टीस बाकी है। उन्होंने कहा कि उन्नीस सौ साठ के आस पास देवीशंकर अवस्थी ने साठ के दशक के मोहभंग (भयावह संदर्भ और कुछ कहानियाँ) पर लिखना महत्वपूर्ण समझा। मैं नहीं जानता कि इस संदर्भ को लेकर जब वह यह लेख सन साठ में लिख रहे थे तो उनके मन में कितना भय था । लेकिन अब जब हम पढ़ते है और ये याद करते हैं कि पंद्रह साल बाद जो इमरजेंसी लागू  होने जा रहीं थी उससे पहले ही भयावह संदर्भों की बात देवीशंकर जी ने सोची थी। उनकी आलोचनादृष्टि अपने समय को तो देख ही रही थी पर साथ ही आने वाले समय को भी देख रही थी। अवस्थी जी के रचना की समग्रता और रचना की आंतरिक सत्ता पर कहे गये कथन उन्हें आज के संदर्भों को लेकर काफी मौजूँ लगे। वे अवस्थी जी के रामविलास जी के संबंध में कहे गये कथन को उद्धृत करते हैं-
“वास्तव में रामविलास जी फौजदारी आलोचक पद्धति के आलोचक हैं। वकील जैसे मुकद्दमें की दरखास्त बनाते समय बहस करते समय अपने मतलब के नुक्ते ढूँढता है वैसे ही रामविलास जी शुक्ल जी के पीछे पड़ गये तो उन्हें रामविलास शर्मा बनाकर छोड़ा, यशपाल जी के पीछ पड़ गये तो उन्हें अ-मार्क्सवादी ही सिद्ध किया।“  वे अवस्थी जी की इस बात से अभिभूत हैं कि रामविलास जी का पूरा सम्मान करते हुए भी देवीशंकर जी  उनके संदर्भ में इतनी मार्के की बात कहते है, जो अंत तक उनके लेखन पर लागू  होती है। सुधीर चंद्र ने अशोक वाजपेयी के संचालन के दौरान आधुनिकता और भारतीयता के संदर्भ में जोड़े़ गये उस सूत्र को पकड़ा जिसमे अशोक वाजपेयी ने भारतीयता को एकवचन में नहीं सोचने की बात कही थी। आधुनिकता और भारतीयता के संदर्भ में सुधीर चंद्र ने इस सूत्र का हवाला देते हुए कहा कि क्या कारण है कि भारतीयता शब्द का उच्चार जैसे ही होता है एक छवि हमारे मन में बन जाती है और वह छवि उस एकवचन की ओर झुकी हुई है जिसकी ओर अशोक ने इशारा किया।

 अशोक वाजपेयी की ही बात को दूसरे ढंग से कहते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुवचन की ही बात नहीं यह एक परंपरा की बात है। परंपरा इस अर्थ में कि भारतीयता कोई ऐसी वस्तु .या कोई ऐसा विचार नहीं है कि जो ऑलरेडी स्थापित हो ये विकसित हो रहा है और इसके विकास में खासी एक लड़ाई और संघर्ष चल रहा है। इसके विकास में कौन सी भारतीयता अथवा भारतीयताएँ आगे जाके बनेगी। जब से भारत में राष्ट्रवाद का विकास हुआ है अवचेतन में हिंदू और भारतीय एक दूसरे के पर्याय बन गये है। चेतन के स्तर पर ये हुआ हो या न हुआ हो ये ज़रूरी नहीं है लेकिन अवचेतन के स्तर पर जब ये होता है तो वो बहुत खतरनाक होता है और राष्ट्रवाद से ही भारतीयता की बात शुरु होती है।  जब हमने भारतीय राष्ट्रवाद को ही हिंदू राष्ट्रवाद का पर्याय मान लिया तो बड़ी खतरनाक शुरुआत हमारे मानसिक विकास की  और भारतीय इतिहास के विकास की होती है जिससे हमें सतर्क रहना होगा। एक उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाने की कोशिश की कि भारत में धर्म और संस्कृति को अलग अलग रखना कितना जरूरी है? क्योंकि बहुधा इसे एक-दूसरे में अंतर्गुंफित करके विचार किया जाता है। अपने वक्तव्य की अंतिम कड़ी में उन्होंने देवीशंकर अवस्थी की आलोचना की शब्दावलियों रचना की समग्रता और रचना की आंतरिक सत्ता के उद्घाटन को समकालीन आलोचना के लिए महत्वपूर्ण बताया।

अगले वक्ता के रूप में राधावल्लभ जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सामान्यतः जो कुछ भारत में दिखाई पड़ता है वह भारतीयता है और जो कुछ भारत में लिखा जा रहा है वो भारतीय है। किसी भी प्रतिभाशाली रचनाकार के द्वारा और उस लिखे हुए पर जो कहा जा रहा है वो भारतीय आलोचना है उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर और अरविंद के माध्यम से भारतीयता को स्पष्ट करने की कोशिश की और कहा कि मैं रवीन्द्रनाथ और अरविंद को आलोचना मे बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ क्योंकि दोनों ने ये अद्भुत कोशिश की, कि वे पश्चिम को बताएँ कि हमारे मानकों से वे क्या हैं? और पश्चिम के सामने अपने मानक रखकर भारतीयता का मूल्याँकन करें कि उनके बरक्स फिर हम क्या हैं? वे रवींद्रनाथ टैगोर की किताब प्राचीन साहित्य के हवाले से कहते हैं कि जिस तरह पॉलिटिक्स और नेशन इन दोनों शब्दों का समवर्ती शब्द हमारी भारतीय भाषाओं में कहीं नहीं है उसी तरह धर्म तो हमारा अपना शब्द है उसका समवर्ती शब्द उनकी भाषाओं में कहीं नहीं है। रवींद्रनाथ और अरविंद द्वारा सुझाये गये दो भारतीय महाकाव्यों(रामायण और महाभारत) के माध्यम से राधावल्लभ त्रिपाठी भारतीयता और भारतीय आलोचना की पहचान करने का मापदंड मानते है उनका कहना हैं कि अगर महाकाव्य की पहचान की जाए तो हमारे सामने उसके दो ही मानक हैं -  रामायण और महाभारत । इनके माध्यम से हम भारतीय आलोचना की और भारतीयता की पहचान भी कर सकते हैं। राधावल्लभ जी का कहना है कि ये दोनों ही समीक्षक भारतीय मानकों से पश्चिम को आँकते हैं। और सवाल उठाते हैं कि पश्चिम इनके आगे क्या है? जहाँ पश्चिम एकदम से कटाक्षेप करके कहता है कि इसके लिए तो हमारे आगे कुछ नहीं है वहीं भारतीय आलोचना और भारतीय दृष्टि उसके पास जाकर के कुछ और सोचने की, बताने की कोशिश करती है। 

इसके बाद अध्यक्षीय वक्तव्य के लिए नित्यानंद तिवारी ने अपने भाषण की शुरुआत अशोक वाजपेयी और राधावल्लभ जी के कथनों पर टिप्पणी करते हुए की उन्होंने कहा कि अशोक जी ने कहा था कि ‘आलोचना और भारतीयता का संबंध या इस संबंध में कोई सवाल नहीं उठाया गया है।‘ पर ऐसा नहीं है सवाल उठाया गया है। उन्होंने अपनी बात के प्रमाण स्वरूप हजारी प्रसाद द्विवेदी की दो किताबों साहित्य का मर्म और लालित्य तत्व का हवाला दिया। और साथ ही कहा कि यह सवाल सिर्फ द्विवेदी जी ही नहीं बल्कि शुक्ल जी ने भी उठाया है इसलिए ऐसा नहीं है कि यह विषय (आलोचना और भारतीयता) कोई अजूबा हों, या इससे पहले जेहन में न आया हो। इसके बाद उन्होंने राधावल्लभ जी के द्विवेदी जी के संदर्भ मे कहे गये कथनों पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि विनिवेशण, अन्यथाकरण, अन्वयन, भावानुप्रवेश, यथालिखितानुभाव, करणविगम आदि एस्थेटिक्स की शब्दावली हैं जिसे द्विवेदी जी ने निकाला, काव्यशास्त्र नहीं। साथ ही अचरज व्यक्त किया कि इस शब्दावली का उपयोग या इसको समझने का उपक्रम हिंदी आलोचना में अब तक क्यों नहीं किया गया? उन्होंने सुधीर चंद्र द्वारा उठाए गये धर्म और संस्कृति के सवाल को एक अच्छा सवाल क़रार देते हुए कहा कि संस्कृति धर्म का अतिक्रमण करके भी हो सकती है। भारतीय संस्कृति क्या हमें कहीं से यह सिखाती है कि धर्म की या जाति की या क्षेत्र की जो सीमाएँ हैं उन सीमाओं का अतिक्रमण करके हम भारतीय हो सकते हैं? भारतीय दर्शन और संस्कृति के संदर्भ में नित्यानंद जी ने अपने प्रिय ग्रंथ पद्मावत के हवाले से कहा कि अगर हिंदू मुसलमान न होते। ये दो समाज न होते दोनों ऐसे समाज थे कि कोई एक-दूसरे को पराभूत नहीं कर सकता था। साथ साथ रहते हुए अगर वे अपनी कुछ संपर्क विधियाँ विकसित कर सकते हैं तो उससे कुछ नया साहित्य लिखा जा सकता है और पद्मावत ऐसा ही साहित्य ग्रंथ है। उन्होंने अशोक जी के बहुलता शब्द का बहुधा इस्तेमाल किये जाने पर चुटकी भी ली और कहा कि उनका यह प्रिय शब्द है, बहुत दिन से वे इसका  प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन मेरे दिमाग में ये बात कभी नहीं आई कि मैं उनसे पूछूँ  कि बहुलता की जगह विविधता का प्रयोग वे क्यों नहीं करते और बहुलता मे क्या कुछ ऐसी विशिष्टता है जो विविधता में नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि ये विविधताए परस्पर संवादमय होती है और बहुलता भी परस्पर संवादमय हो सकती है। लेकिन उसमें इस बात की संभावना भी लगती है कि वो परम स्वतंत्र हो जाए। बहरहाल इन टिप्पणियों से इतर उन्होंने आधुनिकता और भारतीयता पर तीन बिंदुओं को उठाते हुए अपनी बात रखी पहला बिंदू था कुँवर नारायण जी का कथन जिसमें उन्होंने कहा था कि वस्तुओं के क्षेत्र में ही नहीं विचारों के क्षेत्र में भी बाज़ार मूल्य प्रवेश कर चुका है। दूसरा बिंदू था कि आज के आलोचनात्मक 'विमर्श' पश्चिम तर्कों से अनुकूलित होते जा रहे हैं या नहीं? तीसरा बिंदू रहा कुछ समय पहले दिल्ली के रिक्शे वालों के संदर्भ मे आया सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय। जिसमें न्यायाधीश रिक्शवालों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहते हैं कि गरीब आदमियों के वाहन का सवाल है। आप उन लोगों को क्यों नहीं रोकते जो सड़क पर चलते हुए तमाम एक्सीडेंट करते हैं और खून-खराबा करते हैं। उनके लिए आप क्यों नहीं नियम बनाते, बड़े आवेग के साथ न्यायाधीश ने यह बात कही है और ये तीनों बिंदू मिलकर एक ब़ड़ा संक्रांत बिंदू बनाते हैं। 
अपनी बात वे दूसरे बिंदू से शुरु करते है जो बाद में पहले वाले बिंदू से जुड़ जाती है। दूसरे बिंदू के संदर्भ में उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा, शुक्ल जी और द्विवेदी जी की आलोचना पश्चिम से प्रभावित जरूर है पर वह वहाँ से अनुकूलित नहीं हैं। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को वे अपना प्रेरणा पुरुष बताते है और कहते है कि उन्होंने ही सबसे अधिक पश्चिम की आलोचना से लड़ाई लड़ी है। शुक्ल जी ने भी उतनी लड़ाई पश्चिम की आलोचना से नहीं लड़ी है और इसलिए आलोचना और भारतीयता का प्रसंग वहाँ पूरी गंभीरता से उपस्थित है। नित्यानंद जी द्विवेदी जी के ही माध्यम से आलोचक को सहृदय पाठक मानने के पक्ष में हैं। तर्क करने की क्षमता और ग्रहण व त्याग का विवेक देशकाल से आता है उनका मानना है कि यही आकर द्विवेदी जी और कुँवर नारायण एक बिंदू पर मिल जाते हैं। और वे सवाल उठाते है कि जिस प्रकार कुँवर नारायण का कथन बाज़ारवाद के खिलाफ है वैसे ही क्या द्विवेदी जी पश्चिम से प्रभावित होते हुए भी पश्चिम की आलोचना को चुनौती नहीं देते?  अब अगर कुँवर जी ये बात कहते हैं तो क्या गलत है कि विचारों में भी बाजारवाद प्रवेश कर गया है।
वे समकालीन साहित्य पर विचार करते हुए उन धारणाओं को खारिज करते है जो इसे बेहद दुर्वल मानकर चलती है। उनके लिए आलोचक  सिर्फ वही नहीं है जो समकालीन साहित्य को पढ़ता है। वे आलोचक का ये अनिवार्य कर्तव्य और गुण मानते हैं कि उसे अपनी परंपरा का भी पूरा ज्ञान हो सिर्फ समकालीनता की जद में रहकर आलोचना नहीं हो सकती। उनका खयाल है कि हमारा साहित्य दुर्बल नहीं है और आज का भी जो रचनात्मक साहित्य है वो मुझे दुर्बल नहीं दिखता। हमारी आलोचना देखे या न देखे लेकिन हमारा आज का बहुत ढ़ेर सारा साहित्य है जो दुर्बल नहीं है। सवाल आलोचना और आलोचकों का है?

इस तरह के बहसनुमा वक्तव्यों के साये में यह आयोजन सफल रहा। सबसे खास रहा अवस्थी जी की नातिन शाश्वती द्वारा देवीशंकर अवस्थी के लेख आधुनिकता और भारतीयता के आरंभिक अंश का पाठ। जिसने वक्तव्यों को मूल मुद्दे पर केंद्रित रहने में मदद की। इस अवसर पर अवस्थी जी के परिवार के सदस्यों और वक्ताओं के अलावा मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, संजीव कुमार, अनामिका, अर्चना वर्मा सरीखे विद्वान लेखको, प्राध्यापकों और शोधार्थियों की उपस्थिति देखने लायक थी। अंत में धन्यवाद ज्ञापन अशोक वाजपेयी ने किया।
                                                 (prastuti- Tarun Gupta)