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Sunday, 12 June 2016

2015 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक वैभव सिंह को

जो दोस्त सम्मान समारोह में नहीं जा सके थे या आम के आम और गुट्ठलियों के भी दाम पाने की इच्छा से समारोह को छोड़ पास की मार्केट का रुख कर गए थे। उनके लिये यह रिपोर्ट शायद कुछ जानकारी लायक हो।
विभिन्न पत्रिकाओं के संपादक बेझिझक इस रिपोर्ट का प्रयोग अपनी पत्रिकाओं हेतु कर सकते हैं।

इक्कीसवाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान युवा आलोचक वैभव सिंह को उनकी पुस्तक ‘भारतीय उपन्यास और आधुनिकता’ के लिये प्रदान किया गया। यह समारोह प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी आलोचक देवीशंकर अवस्थी के जन्मदिवस 5 अप्रैल को साहित्य अकादमी के रवीन्द्र भवन में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वैभव सिंह ने देवीशंकर अवस्थी की पुण्य स्मृति को नमन किया और उन्हें एक निष्पक्ष आलोचक बताते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि आलोचना यदि निष्पक्ष नहीं है तो बहुत दूर तक नहीं जा सकती, अवस्थी जी ने इसी आलोचना का विकास किया। जैसाकि देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह की परंपरा रही है इस वर्ष भी देवीशंकर अवस्थी के प्रतिनिधि आलोचना लेखों में से चुनकर एक लेख ‘नई पीढ़ी और उपन्यास’ का वाचन युवा आलोचक संजीव कुमार द्वारा किया गया।
हिंदी के पाठक समुदाय को उदार और न्यायप्रिय बनाना भी आलोचना की ज़िम्मेदारी है।
देवीशंकर अवस्थी सम्मान समिति ने वर्ष 2015 का सम्मान उत्कृष्टता, प्रासंगिकता और विश्लेषण क्षमता के लिये श्री वैभव सिंह को उनकी पुस्तक ‘भारतीय उपन्यास और आधुनिकता’ पर सर्वसम्मति से देने का निर्णय लिया है। ध्यातव्य है कि अशोक वाजपेयी, मैनेजर पांडेय, नंदकिशोर आचार्य, विजय कुमार, और कमलेश अवस्थी देवीशंकर सम्मान समिति के सदस्य हैं।
अशोक वाजपेयी ने देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार मंडल की ओर से वैभव सिंह की प्रशस्ति पढ़ते हुए कहा कि “वैभव सिंह उन लोगों में से हैं जिन्होंने उपन्यास की आलोचना सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में बहुत गंभीरता से की है। अपने करियर की शुरुआत उन्होंने वायु सेना में थल अधिकारी के रूप में की लेकिन उपन्यास पर लिखने वाला मन सेना की नौकरी में कहाँ रमता। आलोचना के क्षेत्र में ‘इतिहास और राष्ट्रवाद’, ‘भारतीय उपन्यास और आधुनिकता’ तथा ‘शताब्दी का प्रतिपक्ष’ उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘मार्क्सवाद और साहित्यालोचन’ तथा ‘भारतीयता की ओर’ के नाम से टैरी ईगल्टन और पवन कुमार वर्मा की पुस्तकों का अनुवाद भी किया है। वैभव सिंह का आलोचना कर्म कविता, कहानी, उपन्यास इतिहास, राष्ट्रवाद और आधुनिकता संबंधी वाद विवाद तथा बहसों तक फैला हुआ है। अपनी आलोचनादृष्टि को परिपक्व और धारदार बनाने में उन्होंने समाजविज्ञान का भरपूर सहारा लिया है। वे मानते हैं कि हिंदी के पाठक समुदाय को उदार और न्यायप्रिय बनाना भी आलोचना की ज़िम्मेदारी है। उनकी आलोचनापद्धति में जातीय स्मृतियों के साथ साथ तर्कसंगत और जनपक्षीय एवं आधुनिकता संबंधी आकांक्षाओं की भी अनुगूँजें सुनायी पड़ती हैं। उनकी पुस्तक भारतीय उपन्यास और आधुनिकता 19वीं सदी में उपन्यास के उद्भव और विकास से लेकर औपनिवेशिक आधुनिकता से भारतीय समाज के द्वंद्वात्मक संबंधों की खोजबीन, विश्लेषण और पड़ताल करती हैं। वे मानते हैं कि राष्ट्रवाद की अवधारणा के विकास की प्रक्रिया बहुआयामी रही है इसके अंतर्गत परंपरागत संस्कारों और औपनिवेशिक प्रभावों से टकराहट को भारतीय उपन्यासों में दर्ज किया गया है। वैभव सिंह अत्यंत साफगोई के साथ अपने तर्कों एवं तथ्यों के माध्यम से भारतीय उपन्यास के इतिहास को खंगालते हुए बताते हैं कि आधुनिकता का विकास एक लंबी परियोजना की तरह हमारे सामने उपस्थित है। आज टैगोर के गोरा की संवादधर्मी आधुनिकता हमारी पथप्रदर्शक हो सकती है। कवि अरुण कमल पर केंद्रित एक किताब के साथ साथ इन्होंने यशपाल के उपन्यास दिव्या की आलोचनाओं का एक संस्करण भी संपादित किया है। इसके अतिरिक्त अभय कुमार दुबे द्वारा संपादित ज्ञानकोष में इन्होंने विविध विषयों पर अपनी टिप्पणियाँ लिखी हैं।“
इस अवसर पर उपन्यास और समकाल विषय पर गोष्ठी भी आयोजित की गई। जिसमें पुरुषोत्तम अग्रवाल और मृदुला गर्ग ने भाग लिया जिसकी अध्यक्षता नामवर सिंह ने की और मंच संचालन रवींद्र त्रिपाठी ने किया।
दरअसल उपन्यास समाज की नहीं बल्कि सैल्फ या आत्म की चीज़ है। - वैभव सिंह
इस गोष्ठी के मूल विषय को विस्तार देते हुए आलोचना और उपन्यास का समकाल शीर्षक अपने वक्तव्य में वैभव सिंह ने कहा कि पूँजी और बाज़ार की लगातार बढ़ती पैठ ने आलोचना के लिये संकट खड़ा कर दिया है और इस संकट से लड़ने के लिये हम दिखावे के लोकतंत्र के भरोसे नहीं बैठ सकते। जिस साहित्य की आलोचना की हम बात कर रहे हैं वह सभ्यता और समाज की आलोचना के बिना संभव नहीं है बल्कि साहित्य की आलोचना तो दरअसल सभ्यता और समाज की आलोचना का ही विकास है।
आलोचना साहित्य की सबसे अनूठी विधा है और यह दावा कर सकती है कि वह सृजनात्मक होने के साथ साथ विचार, ज्ञान और प्रश्नाकुल बौद्धिकता की वाहक ही नहीं है बल्कि उनके विकास के लिये उत्तरदायी भी है। आलोचना समाज की उस इच्छा को व्यक्त करती है जिसमें समाज व सभ्यताएँ अपना सर्वश्रेष्ठ वैचारिक स्वरूप कल्पित करते हैं पर उस स्वरूप को हासिल करने की विधि को नहीं जानते अथवा उस को प्राप्त करने का साहस नहीं करते है। वैभव सिंह ने आलोचना के लिये समकाल की महत्ता निर्दिष्ट करते हुए कहने हुए टैगोर के हवाले से कहा कि आलोचना हमारी आँखों पर चढ़े बहुत सारे बासी, पुराने और जर्जर हो चुके नज़रियों से ही नहीं बल्कि नए परोसे गए छद्म पर चमकदार नज़रियों से हमें मुक्त करती है। और रोज़ ही ‘नई आँखों से दुनिया को देखना सिखाती है।‘ वर्तमान समकाल के सबसे क्रूर संकट को इंगित करते हुए वैभव सिंह ने कहा कि पूंजी और बाजार की लगातार निरंकुश होती कैद में आलोचना के लिये जगह घट रही है फिर आलोचना पर प्रायोजित चीज़ों का दबाव बढ़ रहा है और यह प्रायोजित और छद्म आलोचना को जन्म दे रहा है। सत्ता, पूंजी और धर्म का वर्चस्व किसी किस्म की असहमति या आलोचना को हतोत्साहित ही नहीं बल्कि दंडित करने के लिये पूरी चेष्टा कर रहा है। एक विराट निगरानी तंत्र पैदा किया जा रहा है जो हर तरह के लोकतंत्र पर भारी पड़ रहा है और नागरिक के जीवन पर राज्य की जासूसी लगातार तेज़ होती जा रही है।
उपन्यास के संदर्भ में उन्होंने सैल्फ की महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा कि सैल्फ खोजने और समझने की चीज़ है, उपन्यास पढ़कर ही हम आत्म या सैल्फ को खोज और विकसित कर पाते हैं। दरअसल उपन्यास समाज की नहीं बल्कि सैल्फ या आत्म की चीज़ है। आज के उपन्यास अन्य कलाओं से अपने को काट रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। जब उपन्यास का आगमन होता है तभी आधुनिकता आगमन भी होता है।
वैभव ने समकाल की मुश्किलों को तफ्सील से बताया और कहा कि मुश्किल यह है कि जब आप दुनिया को बदलने का स्वप्न देखते हैं तो कहा जाने लगता है कि अब ऐसे सपनों के लिये कोई जगह नहीं रह गई है और दुनिया को बदलने का कोई भी विचार वस्तुगत मानदंडों पर प्रासंगिक नहीं रह गया है। पिछली सदी के आखिरी दशक में फ्रांसिस फूकोयामा ने एंड ऑफ हिस्ट्री की सैद्धांतिकी प्रस्तुत कर दुनिया के बौद्धिकों में हलचल मचा दी थी पश्चित में यह हो सकता है लेकिन भारत जैसे महादेश में इतिहास का अंत स्वाभाविक रूप में नहीं हो रहा हो तो हिंसा कर, सत्ता के संसाधनों का उपयोग कर या फिर पोपगेंडा करके इतिहास का अंत करने की चेष्टाएँ की जा रही हैं। अपने विस्तृत और प्रभावशाली आलेख के अंत में उन्होंने कहा कि उपन्यास के समकाल पर बात करते हुए हम यह कह सकते हैं कि 21वीं सदी के उपन्यासों ने विषय शिल्प के स्तर पर नये प्रयोग तो किए हैं पर बीसवीं सदी के औपन्यासिक चेतना को त्यागा नहीं है और न ही कोई नाटकीय अलगाव पैदा करने का प्रयास किया है उसका कारण यह है कि भारतीय समाज में बहुत सारी समस्याएँ जस की तस बरकरार हैं जिनसे पिछली सदी के लेखक जूझते रहे हैं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि बीसवीं सदी की कला चेतना से आज के उपन्यास दूर जा रहे हैं।
उपन्यास आधुनिकता का लक्षण है, उसका नियामक तत्त्व नहीं है। - पुरुषोत्तम अग्रवाल
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने उपन्यास के संदर्भ में कहा कि ग्रांड नैरेटिव का रिपलेसमेंट एक बेहतर ग्रांड नैरेटिव ही हो सकता है। उपन्यास आधुनिकता का लक्षण है, उसका नियामक तत्त्व नहीं है। हम जब समकाल की बात करते हैं तो मुझे बारंबार एरिक ह़ॉब्सबॉम की किताब का शीर्षक याद आता है ऐज ऑफ एक्सट्रीम। उनके लिये 19वीं सदी पहले महायुद्ध से 1992 में खत्म हो जाती हैं। इतिहास का अंत मानने वाले फूकोयामा अमेरिकन डेमोक्रेसी को वीटोक्रेसी कहते हैं। जो किसी के प्रति एकाउंटेबल नहीं है बस फंडिग एजेंसी के प्रति एकाउंटेबल हैं। जिस लिबरल डेमोक्रेसी के अंत को उसने इतिहास का अंत मान लिया था आज उसकी खुद की सोच भी बदल गयी। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने वर्तमान संदर्भसापेक्षता में टेलीविजन को आज के समकाल का सबसे बड़ा संकट ठहराते हुए कहा कि आज अगर समकाल का सबसे बड़ा संकट यदि कोई है तो सोशल मीडिया, टेलीविज़न आदि का विकास है आज हम अपने देश में देख रहे कि आप झूठे सच्चे वीडियों के जरिये किसी संस्थान किसी व्यक्ति को टारगेट कर सकते हैं। क्या इसमें टेलीविजन का पूरा स्वरूप ही जिम्मेदार नहीं है। उपन्यास में हिंसा की उपस्थिति और व्यक्तिकरण को दरशाते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान में हिंसा की स्वाभाविकता उसका नॉर्मालाइजेशन आप देख सकते हैं। उपन्यास के जिस समकाल की हम बात कर रहे हैं यह हिंसा जितनी अधिक उपन्यास के जरिये व्यक्त होती है उतनी जल्दी कविता या कहानी में नहीं होती। हमारी पीढ़ी को यह ईमानदारी से पूछना चाहिये कि हममे से कितनों को नेल्ली याद है। इसलिये कि आपकी सामाजिक अंतरात्मा को नेल्ली याद नहीं है हमें सबको दिल्ली का 1984 याद है लेकिन 1983 में घटित नेल्ली हममें से किसी को याद नहीं है। उन्होंने भारत के इतिहास में सन 1983 और 1984 को राजसत्ता और उसकी निरंकुशता के महत्वपूर्ण वर्ष बताते हुए कहा कि सन 83-84 भारत के इतिहास का वो समय है जब राजसत्ता की एक निर्बाध निरंकुशता आपके सामने स्पष्ट होने लगती है। हम आज उस स्थिति में पहुँच गये हैं जहाँ हिंसा या क्रोध का सिनिकल इस्तेमाल करके राजनीति आगे बढ़ती है यह है समकाल। और इन सब स्थितियों से जो विधा टकराती है वह है उपन्यास। मृदुला गर्ग का उपन्यास वसु का कुटुम्ब, अखिलेश का निर्वासन, हृदेश जोशी का उपन्यास है लाल लकीर इन तीन उपन्यास को वर्तमान समकाल के महत्त्वपूर्ण उपन्यास बताते हुए लाल लकीर के हवाले से उन्होंने कहा कि अगर आप राजसत्ता की हिंसा का जवाब राजनीतिक हिंसा से देते है तो उससे लाभ राजसत्ता को ही होता है।
मैं नेम ऑफ द रोज़ मेँ एक चरित्र पुस्तकों और पुस्तकालयों की सुरक्षा के लिये लड़ रहा है। यह सालों पहले लिखा उपन्यास आज मझे बहुत ज्यादा प्रासंगिक मालूम होता है। हमारे समकाल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहाँ कल्पना करने की छूट आपको नहीं दी जाती। टेलीविजन आपके 24 घंटे पीछे पड़ा है। अब टेलीविज़न आपको बंद करता है आप टेलीविज़न बंद नहीं करते दरअसल रिमोट किसी और के हाथ में है। ऐसे समय में आपके पास कल्पना करने का समय नहीं है और यदि समय है तो उसकी अनुमति नहीं है। मेरी समझ से आज के समकाल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या हम ऐसी कल्पना करने का भी समय और अवकाश बचा पाएंगे जिसमें स्वयं को सत्य का एकमात्र अधिकृत व्याख्याकार समझने वाला सदियों पहले रटे गए शब्दों को दोहराने वाले कुरूप कौए जैसा नज़र आए।
आज का समकाल विश्वविद्यालयों में है जहाँ सवाल पूछने की मनाही है - मृदुला गर्ग
मृदुला गर्ग ने कहा कि यह कैसा समकाल है जहाँ आप मान्यताओं पर प्रश्न नहीं कर सकते, रुढ़ियों पर प्रश्न नहीं कर सकते, राष्ट्र पर प्रश्न नहीं कर सकते, यह कैसी औपनिवेशिक मानसिकता है जहाँ प्रश्न पूछने पर पाबंदी है।
देवीशंकर अवस्थी को नमन करते हुए मृदुला जी ने डेराजिवो के कॉलेज के निष्कासन की वर्तमान प्रासंगिकता पर ध्यान दिलाया और कहा कि आज का समकाल विश्वविद्यालयों में है जहाँ सवाल पूछने की मनाही है। एक तरफ तो वंचित, प्रताड़ित लोग इस समाज में अपने कटुअनुभव उपन्यासों के माध्यम से बयां कर रहे हैं और जितना वो मुखर हो रहे है उतना ही उन लोगों को बरदाश्त नहीं हो रहा जो अब तक अपने को उच्च कोटि पर मानते आए हैं। आज हमारा जो समकाल है उसमें असहिष्णुता के समावेश से हम इंकार नहीं कर सकते। क्या हम अभी अचानक असहिष्णु हो गये या हमेशा से हममें और हमारी संस्कृति में असहिष्णुता रही है। हमारी सभ्यता और संस्कृति में सहिष्णुता और असहिष्णुता का बड़ा अजीब घालमेल रहा है एक तरफ तो हम उन लोगों के साथ बहुत सहिष्णु रहे जो हमारे देश में पनाह मांगने या आक्रमण करने के मकसद से आए और यहीं रच बस गए। वहीं हमारी ही संस्कृति के भीतर जो असहिष्णुता का मूल था जिसका एक अंग जातिवाद या जाति व्यवस्था था और आप जानते है कि जाति व्यवस्था नस्लवाद के सबसे घिनौने स्वरूपों में से एक है। यह योजनाबद्ध तरीके से सदियों से चला आ रहा है। एक दूसरे प्रकार की असहिष्णुता हमारे यहाँ तीसरे जेंडर को लेकर है। जिस समाज में ऐसी असहिष्णुता हो वह कैसे अपने असहिष्णु कह सकता है।
मृदुला जी ने भारतीय समकाल की दो महत्त्वपूर्ण घटनाओँ भारत पर चीन का आक्रमण और आपातकाल का संदर्भ देते हुए कहा कि 1962 तक हम सपने ही देखते रहे लेकिन चीन के आक्रमण ने हमारे विश्व गुरू होने के भ्रम को तोड़ दिया लेकिन उसके बाद हमें यह भ्रम रहा कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। लेकिन आपातकाल के दौर ने हमारा वह भ्रम भी तोड़ दिया। और बाद में सत्ता के मुँह जो निरंकुशता का खून लग गया था वह कैसे छूटता। आज हमारी माँगे भी प्रायोजित हो चुकी हैं। हमने आरक्षण दिया पर शिक्षा नीति नहीं बनाई शिक्षा नहीं दी। अगर 90 प्रतिशत अंक लाकर भी आपको कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाता तो हम कैसी शिक्षा पद्धति का निर्माण कर रहे हैं। सरकारी कॉलेजों होंगे तो वहाँ प्रश्न पूछने पर मनाही होगी. ऐसे विश्वविद्यालयों का क्या खाक फायदा होगा। हम अभी औपनिवेशिक मानसिकता में जीते हैं हम अब ब्रिटेन के उपनिवेश न होकर अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के उपनिवेश हैं। 1984 में जब भोपाल गैस कांड हुआ तब आँकड़ों को तोड़ा मरोड़ा गया। जो यूनिअन कार्बाइड ने किया। आज तक उस पैस्टिसाइड का हमारी सरकार पता नहीं लगा पाई और पता था तो बता नहीं पाई इसलिये उस पैस्टिसाइड का इलाज नहीं हो सका। यह दरअसल हमारे समकाल का सबसे बड़ा संकट है।
पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार का मूल्य बढ़ता है – नामवर सिंह
अपना अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए नामवर सिंह ने कहा कि वैभव के वक्तव्य ने बता दिया कि जिसे यह पुरस्कार दिया गया है वह इसके योग्य है, यह पुरस्कार की विश्वसनीयता को बढ़ाता है। दरअसल पुरस्कृत लोगों से पुरस्कार का मूल्य बढ़ता है, उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है।
इस अवसर पर सांसद डी.पी. त्रिपाठी और साहित्य समाज की जानी मानी हस्तियाँ के साथ साथ अवस्थी जी का पूरा परिवार मौजूद रहा। समारोह में आए सभी गणमान्य अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन अवस्थी जी के ज्येष्ठ सुपुत्र श्री अनुराग अवस्थी ने किया।
प्रस्तुति
तरुण
(तदर्थ प्रवक्ता)
शिवाजी कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय

मोबाइल - 9013458181 

Saturday, 13 April 2013

17वाँ देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान प्रियम अंकित को ...


समकालीन हिंदी आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिये देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान किसी युवा आलोचक(४५ वर्ष की आयु तक) को १९९५ से हर वर्ष प्रसिद्ध आलोचक देवीशंकर अवस्थी की स्मृति में उनके जन्म दिवस ०५ अप्रैल को दिया जाता है। इस बार का १७वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान  वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र यादव द्वारा आलोचक प्रियम अंकित को उनकी आलोचना पुस्तक ‘पूर्वाग्रहों के विरुद्ध’ पर साहित्य अकादमी सभागार में ०५ अप्रैल को प्रदान किया गया इस अवसर पर आयोजित ‘आलोचना के नये पूर्वाग्रह’ विषयक गोष्ठी में वैभव सिह, बजरंग बिहारी तिवारी, अभय कुमार दुबे और प्रियम अंकित नें अपने वक्तव्य दिये और कार्यक्रम का संचालन संजीव कुमार ने किया।  
पुरस्कार निर्णायक समिति के वक्तव्य और प्रशस्ति पाठ का वाचन करते हुए आलोचक नित्यानंद तिवारी ने बताया कि इस पुरस्कार का चयन पाँच सदस्यीय निर्णायक समिति सर्वश्री राजेंद्र यादव, अजित कुमार, नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, और सुश्री अर्चना वर्मा द्वारा सर्वसम्मति से किया गया। इससे पूर्व यह पुरस्कार मदन सोनी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, विजय कुमार, सुरेश शर्मा, शंभुनाथ, वीरेंद्र यादव, अजय तिवारी, पंकज चतुर्वेदी, अरविंद त्रिपाठी, कृष्ण मोहन, अनिल त्रिपाठी, ज्योतिष जोशी, प्रणय कृष्ण, सुश्री प्रोमिला के.पी. ,  संजीव कुमार और जितेंद्र श्रीवास्तव को मिला है वर्ष १९९९ इसका अपवाद है क्योंकि किसी व्यक्ति को सम्मान के योग्य पाया नहीं जा सका था।  
२६ अगस्त १९७६ में कानपुर में जन्मे प्रियम अंकित आगरा कॉलेज, आगरा के अंग्रेजी विभाग में अध्यापनरत हैं उनकी यह पहली पुस्तक समकालीन कहानी की आलोचना में संभावनाओं के नए द्वार खोलती है जिससे अनेक कोणों से आज की कथादृष्टि को परखा जा सकता है।
इस मौक़े पर आलोचक और निर्णायक समिति के सदस्य नित्यानंद तिवारी ने प्रियम अंकित को दिये गये प्रशस्ति पत्र को पढ़ते हुए कहा कि ‘पूर्वाग्रहों के विरुद्ध यह केवल किताब का शीर्षक नहीं है यह प्रियम अंकित की आलोचनादृष्टि का प्रस्थान बिंदु है। प्रगतिवादियों और प्रयोगवादियों की रस्साकशी के पुराने पड़ गये राग को पीछे छोड़ कर वे पूर्वाग्रहों की संहिता के विरुद्ध मोर्चा खोलने के अलावा अपनी पीढ़ी के रचनाकर्म को नवोन्मेष का नाम देते हैं और उसको व्यावहारिक उदाहरणों के साथ सप्रमाण चिंहित करते हैं। उनकी किताब नवोन्मेष की दुनिया के गली, चौराहों, सड़कों, स्थानों, दरवाजों पर लगे नामपट्ट और उन नामों की अपनी विशिष्ट संभावनाओं का नक्शा पेश करती है। इसे नवोन्मेष की इस संहिता का सूत्रपात कहा जा सकता है। नवोन्मेष की इस दुनिया का देशकाल उत्तर आधुनिक है तीसरी दुनिया में इस कालगति के संग अपने परिप्रेक्ष्य में प्रियम निरंतर यह सजगता बनाये रखते हैं कि विकल्पों के अतिशय और बहुलता की इस दुनिया में एक तरफ अब तक स्थिरता और शाश्वतता अर्जित की गई सत्ताओं के खिलाफ़ विद्रोह करने का आत्मतोष तो दूसरी तरफ व्यवस्था परिवर्तन के लिये होने वाले तमाम सकारात्मक प्रयासों को ग्रैंड-नैरेटिव या मेटा-नैरेटिव कहकर खारिज कर देने की सुविधा भी मौजूद है, बहुलता का स्वागत भी है और चुनाव की सावधानी भी, जिसे प्रियम नें नवोन्मेष का नाम दिया है वह अपनी दुनिया के बाहर अभी तक प्रायः कुछ संदेश कुछ आशंका के साथ विवादास्पद है। प्रियम ने एक ओर उसके पक्ष से मोर्चा खोला है तो दूसरी ओर भीतर आने का दरवाजा भी। उन्होंने व्यवस्था और सत्ता के सांस्कृतिक छद्म सूचना प्रौद्योगिकी का अदम्य विस्तार. उपभोक्ता समाज के भीतर पनपती नव-साम्राज्यवादी और फासीवादी प्रवृत्ति, विभ्रम, यथार्थ आदि उत्तर-आधुनिक आलोचना के शब्दकोश और मुहावरों को निरीह अकादमिक और बौद्धिकता के छद्म से छुड़ाकर कहानी के मध्म में निहित सत्य की पहचान का जरिया बनाया है और रचनाओं में अभिव्यक्ति की विडंबनाओं को रेखांकित किया है। हिंदी की आलोचना में इसे एक नई शब्दावली के विकास की पहल के रूप में देखा जा सकता है। हिंदी कहानी के नवोंमेष को अगले पड़ाव को सुव्यवस्थित रूप से चिंहित, सुविचारित ढंग से विश्लेषित और संतुलनपूर्वक मूल्यांकित करने और इस क्रम में आलोचना की एक उपयुक्त शब्दावली विकसित करने के लिए वर्ष २०१३ का देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान प्रियम अंकित को दिया जा रहा है।‘

पूर्वाग्रहों को प्रेरित करते रहा जाए ताकि वे आत्मालोचना से जी न चुराएं – प्रियम अंकित

‘आलोचना के नये पूर्वाग्रह’ विषय पर बोलते हुए प्रियम ने कहा कि ‘रचनाकार और आलोचक दोनों ही एक विशेष समय का और एक विशेष समाज का हिस्सा होते हैं उस समय और समाज की मान्यताएँ, अभिरुचियाँ, संस्कार, आस्वाद, विचार आदि उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के भीतर व्यापते हैं हमारी साहित्यिक चेतना हमारी वास्तविक सामाजिक दुनिया के भीतर ही आकार लेती है हालाँकि यह भी सत्य है कि रचना खुद अपना एक समानांतर समाज भी रचती है और आलोचना की एक जिम्मेदारी यह भी है कि वह इस समानांतर समाज का भी नागरिक होने की तमीज़ हममे पैदा करे।‘ उन्होंने आगे कहा कि ‘हर समाज के अपने पूर्वाग्रह होते हैं क्या यह रचनाकार  और आलोचक दोनो के लिये संभव है कि जिस समाज का हिस्सा वे होते हैं उसके पूर्वाग्रहों का पूरी तरह अतिक्रमण कर सकें। फ़िराक़ साहब के शेर –
‘किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी। 
ये हुस्नो इश्क़ तो धोखा है सब मगर फिर भी।।‘ 

का हवाला देते हुए वे कहते है कि ‘आलोचना का एक काम रचना के भीतर और अपने भीतर इसी ‘मगर फिर भी‘ की व्यापकता और गहराई की खोज करना है आज की हिंदी आलोचना में स्थित पूर्वाग्रहों की खोज के बिंदु बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना में देखने के क्रम में उनका कहना है कि आज आलोचना में जो कुछ भी नया है चाहे वो नया सामर्थ्य हो या नये पूर्वाग्रह उसके सूत्र बीसवीं सदी की हिंदी आलोचना के अंतिम दशक की रचनात्मक और विमर्शात्मक त्वरा में खोजे जा सकते हैं’ वे रचनादृष्टि और आस्वाद के नये धरातल को सुगम बनाने को भी आलोचना का एक प्रमुख काम मानते हैं। वे आगे कहते हैं कि कला तकनीकों के इस्तेमाल को लेकर जो भी पूर्वाग्रह व्याप्त हों - चाहे वे नये हों या पुराने – उनका विरोध करना आलोचना के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। लेकिन आलोचना जब इस पूर्वाग्रह का विरोध करने के क्रम में नये कहानीकारों पर हावी रूपकात्मकता, फैंटेसीप्रियता, वाक्चातुर्य आदि तत्वों का बेजा समर्थन करने लगती है, तो दूसरे किस्म के नये पूर्वाग्रहों की स्थापना होती है। अंत में अपने वक्तव्य का निष्कर्ष देते हुए और पूर्वाग्रह का लगभग समर्थन करते हुए वे कहते है कि “पूर्वाग्रह पुराने हों या नये आखिर तो कहलाएंगे ‘पूर्वाग्रह’ ही आलोचना में अगर कोई पूर्वाग्रह दरकार हो भी, तब भी, आलोचना का भला इसी में है कि पूर्वाग्रहों को प्रेरित करते रहा जाए ताकि वे आत्मालोचना से जी न चुराएं।“ 

रचना कई बार अपने जन्म की परिस्थितियों से पूर्वाग्रह लेकर आती है – वैभव सिंह 

आलोचना के नये पूर्वाग्रह विषय पर अपनी बात रखते हुए वैभव सिंह ने कहा कि जब हम नये पूर्वाग्रह की बात कर रहे होते हैं तो क्या हम यह कह रहे होते हैं कि पुराने पूर्वाग्रह वाकई पुराने पड़ गये है जिसमे कहा जाता था कि अज्ञेय बड़े या नागार्जुन। हालांकि यह बड़ा चुनौतिपूर्ण काम है और यह भी कि पूर्वाग्रह जीवित मनुष्यों के ही होते है मुर्दों के नहीं। लेखक जब भी लिखता है वह समय संकटपूर्ण ही होता है क्योंकि हर युग के अपने संकट होते हैं जिस तरह लेखक के लिेए कोई समय संकटविहीन नहीं होता उसी तर्ज पर लेखक के लिए कोई भी समय पूर्वाग्रहविहीन नहीं होता। पूर्वाग्रह दरअसल इन परिस्थितियों की ही उपज होते हैं। पूर्वाग्रहों का संबंध सिर्फ आलोचक के मन से नहीं होता बल्कि वे अपने समय की विचारधाराओं और अपने समय के वर्चस्वशाली झूठ और वर्चस्वशाली सत्य से आते हैं। रचना कई बार अपने जन्म की परिस्थितियों से पूर्वाग्रह लेकर आती हैं और युगीन परिस्थितियाँ पूर्वाग्रह को जन्म देतीं हैं। अपने समय की रचनाशीलता का विश्लेषण हमेशा से ही आलोचना के लिए एक चुनौती रहा है आज भी एक वर्ग विचारधारा और साहित्य को अलगाने के पक्ष में है। आज जिस तरह से विचारधारा की संस्कृति पर आक्रमण किया जा रहा है वह आलोचना और रचना दोनो की ही संस्कृति के लिये खतरा है। यह एक तरह से आलोचना का बौद्धिक संकट है। वैभव ने आगे सवाल किया कि पूर्वाग्रहों से मुक्ति का क्या अर्थ है? हमें यह भी साफ करना होगा। दरअसल रचना और आलोचना में संबंध बना रहे हमारी कोशिश इसमें निहित रहनी चाहिये। रचना को कच्चा माल समझने से बचना चाहिए यह एक तरह से रचना का निरादर है।


पूर्वाग्रहों से मुक्ति की पूर्व शर्त है पूर्वाग्रहों की ठीक-ठीक पहचान करना – बजरंग बिहारी तिवारी

बजरंग बिहारी तिवारी ने अपने वक्तव्य की शुरुआत में कहा कि पूर्वाग्रहों को पहचाने बिना उनसे मुक्त होने या उन्हें गले लगाने का निर्णय नहीं लिया जा सकता। उनका कहना था कि  वे अपने थोड़े बहुत लेखन और विमर्श के जिस क्षेत्र में सक्रिय हैं वह तो  पूर्वाग्रहों का बड़ा उर्वर इलाका है उन पूर्वाग्रहों  के बारे में न बोलकर उस स्थिति पर बात की जिससे मुखातिब होने से समकालीन हिंदी आलोचना कतराती नजर आती है कतराने का यह उपक्रम पूर्वाग्रह विशेष के चलते है हिंदी की उपभाषाओं के स्वतंत्र होने के आंदोलन में निहित पूर्वाग्रह का जिक्र करते हुए उन्होंने रामविलास शर्मा का हवाला देते हुए कहा कि रामविलास शर्मा ने परंपरा का मूल्याँकन में मैथिली भाषा के आंदोलन पर विचार करते हुए यह उम्मीद जताई थी कि पृथकता का यह आंदोलन सफल नहीं होगा और हिंदी जाति अक्षुण्ण बनी रहेगी पर इतिहास ने उन्हें सही साबित नहीं किया। संस्कृत और प्राकृत के उदाहरणो का प्रयोग कर वे निष्कर्ष निकालते हैं कि इस देश में उनके देखते भाषिक बहुलता शर्म का विषय कभी नहीं रही। जिन्हें हिन्दी की बोलियां कहा जाता है वे भले अब अपने को भाषा कह रहीं हैं इन भाषाओं के बोलने वालों ने अपने को हिंदी से अलगाते हुए स्वतंत्र भाषआ का दर्जा पाने के लिए अपना आंदोलन तेज किया है। कभी इस समस्या पर रामविलास शर्मा ने मैथिली आंदोलन के संदर्भ में कहा था कि यह बोली हिंदी से अलग नहीं होगी पर इतिहास ने उन्हें सही साबित नहीं किया। बोलियों के अलगाव के आंदोलनों के प्रश्न पर समकालीन हिंदी आलोचना किंकर्तव्यविमूढ़ नजर आती है। इस समस्या को सही संदर्भ में समझने के लिए हमें बीसवीं सदी के पहले से चौथे दशक के हिंदी साहित्य की पड़ताल करनी होगी। उनका कहना था कि यह दौर जागरण और सुधार के युग के रूप में जाना जाता है। इसी दौर में हम औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हुए। इसी दौर में हिंदी भाषा की अपेक्षा भाषा का एक अन्य रूप सभ्य होने की शर्त समझा जाने लगा और रीति कविता को एक कलंक समझा जाने लगा। करीब ५०० वर्षों तक जो भाषा अखिल भारतीय स्तर पर साहित्यिक अभिव्यक्ति का सशक्त और स्वीकृत माध्यम थी उसे परिदृश्य से ओझल कर देने का लगभग सफ़ल प्रयास किया गया। अंत में उनका कहना था कि ब्रजभाषा के खिलाफ़ यह अभियान वास्तव में हिन्दी का अपनी ही उपभाषाओं के विरुद्ध अभियान बना। इसके बाद आधुनिक हिन्दी का जो छिन्नमूल अहंकारी रूप निर्मित हुआ वह हम सबके सामने है।

   पूर्वाग्रह अतीत और भविष्य के मध्य सेतु का काम करते हैं – अभय कुमार दुबे

अभय दुबे ने अपने वक्तव्य की शुरुआत बजरंग बिहारी तिवारी के देव के संदर्भ में कहे गये कथन को उठाते हुए की और रामविलास शर्मा के हवालों से इस शीर्षक पर अपना वक्तव्य दिया उन्होंने कहा कि रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल की जो आलोचना स्थापित की वे रामविलास शर्मा के रास्ते होते हुए ही हिंदी में स्थापित हुई। उन्होंने कहा कि रामविलास जी को नायिका-भेद से दिक्कत है जबकि नायक-भेद से नहीं। नायिका-भेद से रामविलास जी को घोर आपत्ति है जो कि एक बड़ा पूर्वाग्रह है। देह विमर्श नाम का एक डंडा हिंदी में बना लिया गया है जिससे हिंदी के नारीवादियों को लगातार पीटा जाता रहा है। पर ऐसा नहीं है कि ‘मैं पूर्वाग्रह को लेकर बहुत चिंतित हूँ मुझे लगता है कि पूर्वाग्रह अतीत और भविष्य के मध्य सेतु का काम करते हैं।‘ उन्होंने हजारी प्रसाद जी के संबंध में रामविलास जी के पूर्वाग्रहों का संकेत देते हुए कहा कि  हजारी प्रसाद जी द्वारा रीतिकाल को सैकुलर काव्य कहने की वजह से रामविलास जी कुपित रहे। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि हिंदी में मार्क्सवादी राजनीति जितनी नाकामयाब है उतना ही सास्कृतिक मार्क्सवाद कामयाब है। इसे थोड़े चुटीले लहजे में लेते हुए उन्होंने कहा कि परम श्रद्धा के साथ मार्क्सवाद की दुनिया में जो नये काम हुए हैं हम उन्हें नहीं पढेंगे। हिंदी की दुनिया अभी भी साठ-स्त्तर के जमाने के मार्क्सवाद में अटकी है। आज की पूँजी को समझने के लिए पुराना मार्क्सवाद कोई सामग्री उपलब्ध नहीं करवाता। ये कैसा पूर्वाग्ह है कि हिंदी के साहित्यिक रूप को तरजीह दी जाती है और बाकि रूपो को खारिज कर दिया जाता है लिखित और पाठीय संस्कृति को इस भाषा ने आतंकित किया है इससे बोलियाँ त्रस्त हैं क्या टी.वी की भाषा का अपना संदर्भ नहीं है जबकि हम जानते है कि वह एक दृश्य भाषा है।
सभी वक्ताओं के वक्तव्य के बाद राजेंद्र यादव ने अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रियम अंकित को बधाई दी पर साथ ही यह चिंता भी जताई की आज के आलोचक समय-समय पर लिखे-पढ़े गये लेखों को जोड़कर किताब की शक्ल दे देते हैं। उन्हें यह शिकायत प्रियम से भी है उन्होंने कहा कि क्या यह अच्छा न होता कि प्रियम प्रतिबद्धता और विचारधारा को लेकर एक पुस्तक लिखते या आलोचना के पूर्वाग्रह नामक इसी पुस्तक को एक सूत्रबद्ध ढ़ंग से लिखते। उन्होंने कमलेश अवस्थी के प्रति अपना आभार जताते हुए कहा कि देवीशंकर जी से उनके व्यक्तिगत संबंध थे। वे आज भी उनसे भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं इसलिये वे यहाँ आ सकें या न आ सकें पर मानसिक रूप से इस समारोह में हमेशा उपस्थित रहते हैं। इसी सुअवसर पर देवीशंकर अवस्थी की पुस्तक ब्रजभाषा भक्तिकाव्य का उत्तरार्द्ध का विमोचन वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव और नित्यानंद तिवारी द्वारा किया गया।  
मंच संचालन देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित आलोचक संजीव कुमार ने किया। इस अवसर पर साहित्य समाज के जाने माने लेखक-साहित्यकार नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, विश्वनाथ त्रिपाठी, सुरेश सलिल, देवेन्द्र राज अंकुर, जितेंद्र श्रीवास्तव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, शरद दत्त, निर्मला जैन, बलराम, देवीप्रसाद त्रिपाठी, पंकज चतुर्वेदी, भाषा सिंह, गंगा प्रसाद विमल, दिनेश मिश्र, मंगलेश डबराल, दिनेश कुमार शुक्ल, प्रसून लतांत, मेत्रैयी पुष्पा, रश्मि वाजपेयी, सुनीता बुद्धिराजा, रेखा अवस्थी व अवस्थी जी का परिवार उनके पुत्र, पौत्र व पुत्र-वधु आदि उपस्थित रहे।        
 प्रस्तुति -  तरुण गुप्ता
मोबाइल - 09013458181

Monday, 7 May 2012

16वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान : एक रिपोर्ट


16वाँ देवीशंकर अवस्थी सम्मान समारोह अपनी परंपरानुसार अवस्थी जी के जन्मदिवस 05 अप्रैल को साहित्य अकादमी के सभागार में संपन्न हुआ। इस मौके पर आधुनिकता और भारतीयता विषय पर इतिहासकार सुधीर चंद्र और संस्कृत के विद्वान राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने अपने वक्तव्य दिये। कार्यक्रम की अध्यक्षता आलोचक नित्यानंद तिवारी ने की। संचालन का दारोमदार संभालते हुए अशोक वाजपेयी ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए कहा कि यह आयोजन दिल्ली के उन बहुत थोड़े से आयोजनों में है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में श्रोताओ की उपस्थिति होती है। ये भी इसकी प्रमाणिकता का एक और साक्ष्य है।

 हर बार की तरह इस बार भी विचार विमर्श के लिए जो विषय चुना गया वह समकालीन आलोचना की चिंताओं को अपने में जज़्ब किये था। विषय था आलोचना और भारतीयता। सबसे पहले जितेंद्र श्रीवास्तव को पुरस्कारस्वरूप प्रशस्ति पत्र और अवस्थी जी की प्रतिमा भेंट की गई। यह पुरस्कार जितेंद्र श्रीवास्तव को उनकी पुस्तक ‘आलोचना का मानुष-मर्म’ के लिये दिया गया। इस अवसर पर जितेंद्र ने अपना वक्तव्य पढ़ते हुए आलोचना को विद्वता प्रदर्शन की नहीं बल्कि सृजन की पाठशाला माना। साथ ही उन्होंने कहा कि जब तक हम लोग आलोचना को आश्रित विधा मानते रहेंगे तब तक उसे दार्शनिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं बना पाएंगे, जो उसका मुख्य कार्य है। उनके लिए आलोचना का आशय रचना की परख के साथ ही इस पक्ष की परख भी है कि वह मानुष-मर्म के विधान का उद्यम करती है या नहीं? यदि आलोचना किसी रचना में निहित मानवीय जिजीविषा और गरिमा का विश्लेषण नहीं कर पाती या उससे बचने का मार्ग खोजती है तो मेरे लिए वह बुद्धि विलास के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे अपनी आलोचना की कसौटी आलोचना में अंतर्वस्तु के सौंदर्य को मानते हैं साथ ही यह भी कहते चलते हैं कि इसका आशय यह नहीं है कि मैं रूप को अस्वीकार कर रहा हूँ। जितेंद्र श्रीवास्तव की चिंताएँ पिछले बीस बाइस वर्षों के साहित्य, समाज और राजनीति में होने वाले परिवर्तनों को लेकर भी है और इस बदलाव को समझने के लिए वे चित्त के बदलाव को समझना आवश्यक मानते हैं वे साहित्य को सुविधा का क्षेत्र समझने वालो के विरुद्ध है उनका कहना है कि साहित्य अनिवार्य रूप से सुविधा का क्षेत्र नहीं है।  इधर के कुछ वर्षों में कविता को खेल समझने का चलन बढ़ा है। यह सिर्फ कविता के लिेए ही नहीं संपूर्ण साहित्य के लिए भी चिंता का विषय है।

 आधुनिकता और भारतीयता विषय पर बोलते हुए सुधीर चंद्र ने कहा कि उनके मन में अवस्थी जी से न मिल पाने की कसक और टीस बाकी है। उन्होंने कहा कि उन्नीस सौ साठ के आस पास देवीशंकर अवस्थी ने साठ के दशक के मोहभंग (भयावह संदर्भ और कुछ कहानियाँ) पर लिखना महत्वपूर्ण समझा। मैं नहीं जानता कि इस संदर्भ को लेकर जब वह यह लेख सन साठ में लिख रहे थे तो उनके मन में कितना भय था । लेकिन अब जब हम पढ़ते है और ये याद करते हैं कि पंद्रह साल बाद जो इमरजेंसी लागू  होने जा रहीं थी उससे पहले ही भयावह संदर्भों की बात देवीशंकर जी ने सोची थी। उनकी आलोचनादृष्टि अपने समय को तो देख ही रही थी पर साथ ही आने वाले समय को भी देख रही थी। अवस्थी जी के रचना की समग्रता और रचना की आंतरिक सत्ता पर कहे गये कथन उन्हें आज के संदर्भों को लेकर काफी मौजूँ लगे। वे अवस्थी जी के रामविलास जी के संबंध में कहे गये कथन को उद्धृत करते हैं-
“वास्तव में रामविलास जी फौजदारी आलोचक पद्धति के आलोचक हैं। वकील जैसे मुकद्दमें की दरखास्त बनाते समय बहस करते समय अपने मतलब के नुक्ते ढूँढता है वैसे ही रामविलास जी शुक्ल जी के पीछे पड़ गये तो उन्हें रामविलास शर्मा बनाकर छोड़ा, यशपाल जी के पीछ पड़ गये तो उन्हें अ-मार्क्सवादी ही सिद्ध किया।“  वे अवस्थी जी की इस बात से अभिभूत हैं कि रामविलास जी का पूरा सम्मान करते हुए भी देवीशंकर जी  उनके संदर्भ में इतनी मार्के की बात कहते है, जो अंत तक उनके लेखन पर लागू  होती है। सुधीर चंद्र ने अशोक वाजपेयी के संचालन के दौरान आधुनिकता और भारतीयता के संदर्भ में जोड़े़ गये उस सूत्र को पकड़ा जिसमे अशोक वाजपेयी ने भारतीयता को एकवचन में नहीं सोचने की बात कही थी। आधुनिकता और भारतीयता के संदर्भ में सुधीर चंद्र ने इस सूत्र का हवाला देते हुए कहा कि क्या कारण है कि भारतीयता शब्द का उच्चार जैसे ही होता है एक छवि हमारे मन में बन जाती है और वह छवि उस एकवचन की ओर झुकी हुई है जिसकी ओर अशोक ने इशारा किया।

 अशोक वाजपेयी की ही बात को दूसरे ढंग से कहते हुए उन्होंने कहा कि यह बहुवचन की ही बात नहीं यह एक परंपरा की बात है। परंपरा इस अर्थ में कि भारतीयता कोई ऐसी वस्तु .या कोई ऐसा विचार नहीं है कि जो ऑलरेडी स्थापित हो ये विकसित हो रहा है और इसके विकास में खासी एक लड़ाई और संघर्ष चल रहा है। इसके विकास में कौन सी भारतीयता अथवा भारतीयताएँ आगे जाके बनेगी। जब से भारत में राष्ट्रवाद का विकास हुआ है अवचेतन में हिंदू और भारतीय एक दूसरे के पर्याय बन गये है। चेतन के स्तर पर ये हुआ हो या न हुआ हो ये ज़रूरी नहीं है लेकिन अवचेतन के स्तर पर जब ये होता है तो वो बहुत खतरनाक होता है और राष्ट्रवाद से ही भारतीयता की बात शुरु होती है।  जब हमने भारतीय राष्ट्रवाद को ही हिंदू राष्ट्रवाद का पर्याय मान लिया तो बड़ी खतरनाक शुरुआत हमारे मानसिक विकास की  और भारतीय इतिहास के विकास की होती है जिससे हमें सतर्क रहना होगा। एक उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाने की कोशिश की कि भारत में धर्म और संस्कृति को अलग अलग रखना कितना जरूरी है? क्योंकि बहुधा इसे एक-दूसरे में अंतर्गुंफित करके विचार किया जाता है। अपने वक्तव्य की अंतिम कड़ी में उन्होंने देवीशंकर अवस्थी की आलोचना की शब्दावलियों रचना की समग्रता और रचना की आंतरिक सत्ता के उद्घाटन को समकालीन आलोचना के लिए महत्वपूर्ण बताया।

अगले वक्ता के रूप में राधावल्लभ जी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि सामान्यतः जो कुछ भारत में दिखाई पड़ता है वह भारतीयता है और जो कुछ भारत में लिखा जा रहा है वो भारतीय है। किसी भी प्रतिभाशाली रचनाकार के द्वारा और उस लिखे हुए पर जो कहा जा रहा है वो भारतीय आलोचना है उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर और अरविंद के माध्यम से भारतीयता को स्पष्ट करने की कोशिश की और कहा कि मैं रवीन्द्रनाथ और अरविंद को आलोचना मे बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ क्योंकि दोनों ने ये अद्भुत कोशिश की, कि वे पश्चिम को बताएँ कि हमारे मानकों से वे क्या हैं? और पश्चिम के सामने अपने मानक रखकर भारतीयता का मूल्याँकन करें कि उनके बरक्स फिर हम क्या हैं? वे रवींद्रनाथ टैगोर की किताब प्राचीन साहित्य के हवाले से कहते हैं कि जिस तरह पॉलिटिक्स और नेशन इन दोनों शब्दों का समवर्ती शब्द हमारी भारतीय भाषाओं में कहीं नहीं है उसी तरह धर्म तो हमारा अपना शब्द है उसका समवर्ती शब्द उनकी भाषाओं में कहीं नहीं है। रवींद्रनाथ और अरविंद द्वारा सुझाये गये दो भारतीय महाकाव्यों(रामायण और महाभारत) के माध्यम से राधावल्लभ त्रिपाठी भारतीयता और भारतीय आलोचना की पहचान करने का मापदंड मानते है उनका कहना हैं कि अगर महाकाव्य की पहचान की जाए तो हमारे सामने उसके दो ही मानक हैं -  रामायण और महाभारत । इनके माध्यम से हम भारतीय आलोचना की और भारतीयता की पहचान भी कर सकते हैं। राधावल्लभ जी का कहना है कि ये दोनों ही समीक्षक भारतीय मानकों से पश्चिम को आँकते हैं। और सवाल उठाते हैं कि पश्चिम इनके आगे क्या है? जहाँ पश्चिम एकदम से कटाक्षेप करके कहता है कि इसके लिए तो हमारे आगे कुछ नहीं है वहीं भारतीय आलोचना और भारतीय दृष्टि उसके पास जाकर के कुछ और सोचने की, बताने की कोशिश करती है। 

इसके बाद अध्यक्षीय वक्तव्य के लिए नित्यानंद तिवारी ने अपने भाषण की शुरुआत अशोक वाजपेयी और राधावल्लभ जी के कथनों पर टिप्पणी करते हुए की उन्होंने कहा कि अशोक जी ने कहा था कि ‘आलोचना और भारतीयता का संबंध या इस संबंध में कोई सवाल नहीं उठाया गया है।‘ पर ऐसा नहीं है सवाल उठाया गया है। उन्होंने अपनी बात के प्रमाण स्वरूप हजारी प्रसाद द्विवेदी की दो किताबों साहित्य का मर्म और लालित्य तत्व का हवाला दिया। और साथ ही कहा कि यह सवाल सिर्फ द्विवेदी जी ही नहीं बल्कि शुक्ल जी ने भी उठाया है इसलिए ऐसा नहीं है कि यह विषय (आलोचना और भारतीयता) कोई अजूबा हों, या इससे पहले जेहन में न आया हो। इसके बाद उन्होंने राधावल्लभ जी के द्विवेदी जी के संदर्भ मे कहे गये कथनों पर अपनी टिप्पणी देते हुए कहा कि विनिवेशण, अन्यथाकरण, अन्वयन, भावानुप्रवेश, यथालिखितानुभाव, करणविगम आदि एस्थेटिक्स की शब्दावली हैं जिसे द्विवेदी जी ने निकाला, काव्यशास्त्र नहीं। साथ ही अचरज व्यक्त किया कि इस शब्दावली का उपयोग या इसको समझने का उपक्रम हिंदी आलोचना में अब तक क्यों नहीं किया गया? उन्होंने सुधीर चंद्र द्वारा उठाए गये धर्म और संस्कृति के सवाल को एक अच्छा सवाल क़रार देते हुए कहा कि संस्कृति धर्म का अतिक्रमण करके भी हो सकती है। भारतीय संस्कृति क्या हमें कहीं से यह सिखाती है कि धर्म की या जाति की या क्षेत्र की जो सीमाएँ हैं उन सीमाओं का अतिक्रमण करके हम भारतीय हो सकते हैं? भारतीय दर्शन और संस्कृति के संदर्भ में नित्यानंद जी ने अपने प्रिय ग्रंथ पद्मावत के हवाले से कहा कि अगर हिंदू मुसलमान न होते। ये दो समाज न होते दोनों ऐसे समाज थे कि कोई एक-दूसरे को पराभूत नहीं कर सकता था। साथ साथ रहते हुए अगर वे अपनी कुछ संपर्क विधियाँ विकसित कर सकते हैं तो उससे कुछ नया साहित्य लिखा जा सकता है और पद्मावत ऐसा ही साहित्य ग्रंथ है। उन्होंने अशोक जी के बहुलता शब्द का बहुधा इस्तेमाल किये जाने पर चुटकी भी ली और कहा कि उनका यह प्रिय शब्द है, बहुत दिन से वे इसका  प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन मेरे दिमाग में ये बात कभी नहीं आई कि मैं उनसे पूछूँ  कि बहुलता की जगह विविधता का प्रयोग वे क्यों नहीं करते और बहुलता मे क्या कुछ ऐसी विशिष्टता है जो विविधता में नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि ये विविधताए परस्पर संवादमय होती है और बहुलता भी परस्पर संवादमय हो सकती है। लेकिन उसमें इस बात की संभावना भी लगती है कि वो परम स्वतंत्र हो जाए। बहरहाल इन टिप्पणियों से इतर उन्होंने आधुनिकता और भारतीयता पर तीन बिंदुओं को उठाते हुए अपनी बात रखी पहला बिंदू था कुँवर नारायण जी का कथन जिसमें उन्होंने कहा था कि वस्तुओं के क्षेत्र में ही नहीं विचारों के क्षेत्र में भी बाज़ार मूल्य प्रवेश कर चुका है। दूसरा बिंदू था कि आज के आलोचनात्मक 'विमर्श' पश्चिम तर्कों से अनुकूलित होते जा रहे हैं या नहीं? तीसरा बिंदू रहा कुछ समय पहले दिल्ली के रिक्शे वालों के संदर्भ मे आया सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय। जिसमें न्यायाधीश रिक्शवालों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहते हैं कि गरीब आदमियों के वाहन का सवाल है। आप उन लोगों को क्यों नहीं रोकते जो सड़क पर चलते हुए तमाम एक्सीडेंट करते हैं और खून-खराबा करते हैं। उनके लिए आप क्यों नहीं नियम बनाते, बड़े आवेग के साथ न्यायाधीश ने यह बात कही है और ये तीनों बिंदू मिलकर एक ब़ड़ा संक्रांत बिंदू बनाते हैं। 
अपनी बात वे दूसरे बिंदू से शुरु करते है जो बाद में पहले वाले बिंदू से जुड़ जाती है। दूसरे बिंदू के संदर्भ में उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा, शुक्ल जी और द्विवेदी जी की आलोचना पश्चिम से प्रभावित जरूर है पर वह वहाँ से अनुकूलित नहीं हैं। पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को वे अपना प्रेरणा पुरुष बताते है और कहते है कि उन्होंने ही सबसे अधिक पश्चिम की आलोचना से लड़ाई लड़ी है। शुक्ल जी ने भी उतनी लड़ाई पश्चिम की आलोचना से नहीं लड़ी है और इसलिए आलोचना और भारतीयता का प्रसंग वहाँ पूरी गंभीरता से उपस्थित है। नित्यानंद जी द्विवेदी जी के ही माध्यम से आलोचक को सहृदय पाठक मानने के पक्ष में हैं। तर्क करने की क्षमता और ग्रहण व त्याग का विवेक देशकाल से आता है उनका मानना है कि यही आकर द्विवेदी जी और कुँवर नारायण एक बिंदू पर मिल जाते हैं। और वे सवाल उठाते है कि जिस प्रकार कुँवर नारायण का कथन बाज़ारवाद के खिलाफ है वैसे ही क्या द्विवेदी जी पश्चिम से प्रभावित होते हुए भी पश्चिम की आलोचना को चुनौती नहीं देते?  अब अगर कुँवर जी ये बात कहते हैं तो क्या गलत है कि विचारों में भी बाजारवाद प्रवेश कर गया है।
वे समकालीन साहित्य पर विचार करते हुए उन धारणाओं को खारिज करते है जो इसे बेहद दुर्वल मानकर चलती है। उनके लिए आलोचक  सिर्फ वही नहीं है जो समकालीन साहित्य को पढ़ता है। वे आलोचक का ये अनिवार्य कर्तव्य और गुण मानते हैं कि उसे अपनी परंपरा का भी पूरा ज्ञान हो सिर्फ समकालीनता की जद में रहकर आलोचना नहीं हो सकती। उनका खयाल है कि हमारा साहित्य दुर्बल नहीं है और आज का भी जो रचनात्मक साहित्य है वो मुझे दुर्बल नहीं दिखता। हमारी आलोचना देखे या न देखे लेकिन हमारा आज का बहुत ढ़ेर सारा साहित्य है जो दुर्बल नहीं है। सवाल आलोचना और आलोचकों का है?

इस तरह के बहसनुमा वक्तव्यों के साये में यह आयोजन सफल रहा। सबसे खास रहा अवस्थी जी की नातिन शाश्वती द्वारा देवीशंकर अवस्थी के लेख आधुनिकता और भारतीयता के आरंभिक अंश का पाठ। जिसने वक्तव्यों को मूल मुद्दे पर केंद्रित रहने में मदद की। इस अवसर पर अवस्थी जी के परिवार के सदस्यों और वक्ताओं के अलावा मैनेजर पांडेय, विश्वनाथ त्रिपाठी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, संजीव कुमार, अनामिका, अर्चना वर्मा सरीखे विद्वान लेखको, प्राध्यापकों और शोधार्थियों की उपस्थिति देखने लायक थी। अंत में धन्यवाद ज्ञापन अशोक वाजपेयी ने किया।
                                                 (prastuti- Tarun Gupta)